कोरोना काल के बाद मानसून सत्र का पहला दिन अमूमन बाकि सभी दिनों से अलग रहा. सांसदों ने जहां बैठ कर ही सवाल पूछे वहीँ सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए भी नज़र आये. संसद में कोरोना महामारी से लेकर सुशांत सिंह राजपूत मामले में ड्रग्स के इस्तेमाल से लेकर कंगना और शिव सेना तक सभी मुद्दों पर सवाल जवाब हुए. मगर इन सबके बीच एक सवाल ऐसा था जो सरकार के गले की हड्डी बन गया. ना निगले बन रहा था न उगलते.
सभी इस बात से बखूभी वाकिफ है की 68 दिनों के देशव्यापी लॉकडाउन में जिसने सबसे ज्यादा मुसीबत झेली वह थे प्रवासी मज़दूर. न सिर्फ उन्हें अपने काम-काज से हाथ धोना पड़ा था बल्कि अपने ठिकानो को छोड़कर पैदल ही अपने घरों की तरफ प्रस्थान करना पड़ा था. न ही उनके लिए पर्याप्त साधन की सुविधाएं थी, न ही खाने की वयस्था थी और न ही मेडिकल की. इसके चलते न जाने कितने प्रवासी मज़दूरों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था.
मगर जब संसद के पटल से केंद्र सरकार से पूछा गया- क्या सरकार के पास इस बात की जानकारी है की लॉकडाउन के समय कितने प्रवासी मज़दूरों की जान गई तो वह बगले झाँकने लगी. केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय ने इस प्रश्न के जवाब में कहा की उनके पास ऐसा कोई डाटा मौजूद नहीं है. यही नहीं, जब मंत्रालय से एक और सवाल पूछा गया की क्या मारे गए प्रवासी मज़दूरों के परिवार वालों को किसी तरह का कोई मुआवज़ा दिया गया. इस पर मंत्रालय ने सफाई दी की जब मौत के आकड़े ही नहीं पता थे तो मुआवज़े का सवाल ही नहें पैदा होता. इस बात को लेकर संसद में कुछ देर हंगामा भी होता रहा.

आपको बतादें की लॉकडाउन के समय से ही प्रवासी मज़दूरों के पलायन और इस पलायन के दौरान हुई मौतों को विपक्ष पुरज़ोर तरीके से उठता रहा है और दूसरी तरफ केंद्र सरकार अपनी पीठ थपथपाती रही है की इस कोरोना काल में वह हर कदम पर प्रवासी मज़दूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही.
