होठों पर चुप्पी, बूथ पर बड़ी कतारें- बंगाल में बदलाव की आहट तो नहीं?

पश्चिम बंगाल में आज पहले फेज का चुनाव है वहीं तमिलनाडु में सभी सीटों पर आज वोट डाले जा रहे हैं। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल दोनों ही जगह से आ रही तस्वीरें और वीडियो यह बता रहे कि लोकतंत्र के महापर्व का उत्साह दोनों ही राज्यों में एक जैसा है। लंबी कतारें और अपने अधिकार के प्रयोग को लेकर सुबह से मतदान केंद्रों पर भारी भीड़ दिखाई दे रही है। तमिलनाडु में जहां स्टालिन की साख दांव पर है वहीं बंगाल में ममता बनर्जी और टीएमसी अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। तमिलनाडु में थालापति विजय एक्स फैक्टर हैं जबकि बीजेपी भी पूरी ताकत से लड़ाई लड़ रही है हालांकि तमिलनाडु से ज्यादा चर्चा पश्चिम बंगाल की है।

बंगाल की 152 सीटें जहां आज मतदान जारी है वहां से आ रही तस्वीरें बहुत कुछ कह रही हैं। पत्रकारों और ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए जनता का मूड भांपने वाले भी हैरत में हैं। जनता मुद्दों को लेकर मुखर नहीं है लेकिन उत्साह भरपूर है। खास कर महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों में अपने मताधिकार के प्रयोग को लेकर होड़ लगी हुई है। मतदान रिकॉर्ड तोड़ होगा ऐसा प्रतीत हो रहा है। चुनाव आयोग की अभूतपूर्व तैयारियों ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है, लोगों में जो डर पिछले चुनावों में था वह नदारद है। रिजर्व पुलिस फोर्स के जवान चप्पे चप्पे पर महीनों से तैनात हैं और यहीं रहेंगे यह भरोसा लोगों को है और यह उम्मीद भी की बंगाल में इस बार वह हिंसा, वह राजनीतिक हत्याओं का दौर, वह गुंडागर्दी नहीं होगी।

बंगाल में ध्यान देने वाली सबसे रोचक बात यह है कि ममता बनर्जी ने महिलाओं, युवाओं को साधने के लिए खूब पैसे बांटे। यह रकम चुनावों से ठीक पहले बढ़ाई भी गई, खूब लोकलुभावन घोषणाएं भी हुई लेकिन इसके बावजूद भाजपा का यह दावा कि साइलेंट सुनामी ममता बनर्जी के खिलाफ है क्या तर्कसंगत है? दूसरों राज्यों मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार इस बात के उदाहरण हैं कि जहां भी महिलाओं को सरकार में साधा वहां चुनाव परिणाम पलटे नहीं। ऐसे में क्या ममता बनर्जी के कॉन्फिडेंस में होने का यही एक कारण है? क्या बीजेपी को साइलेंट वोटर से बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं?

आम तौर पर उत्तर भारत के राज्यों में जब चुनाव होते हैं जनता मुखर होकर मुद्दों, पक्ष – विपक्ष की बात करती है लेकिन बंगाल में बिल्कुल चुप्पी है। यह खामोशी शायद टीएमसी के डर और पुराने हिंसक अनुभवों को ध्यान में रख कर जरुरी भी है। अगर यही खामोशी रही और मतदान केंद्रों पर जो कतारें हैं, जो निर्वाचन विभाग की तैयारी है उसके बाद यह ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी है। हिंसा और रोहिंग्याओ का मुद्दा जनता के सिर चढ़ कर बोल रहा है और ऐसा लग रहा है बीजेपी का चुनावी नारा भय आउट, भरोसा इन काम कर गया है। बंगाल से अब तक कहीं से भी कोई अप्रिय या हिंसक घटना की खबर नहीं है यह भी अपने आप में बड़ी और राहत देने वाली बात है।

बंगाल का इतिहास रहा है कि वह बहुत बदलाव के पक्ष में कभी नहीं रहा, देश भर के मतदाताओं से इतर बंगाल ने जिसपर भरोसा किया है उसे लंबा समय दिया है। चाहे वह कांग्रेस हो, वाम दल हों या ममता बनर्जी लेकिन अगर इन चुनावों में बदलाव हुआ तो यह तय मानिए टीएमसी और ममता की तुष्टिकरण की राजनीति, हिंसा का लंबा दौर, गरीबी, बेरोजगारी और केंद्र की सरकार से लंबी राजनीतिक लड़ाई से अब बंगाल की जनता परेशान हो चुकी है। भाजपा ने पूरी ताकत झोंक रखी है देश भर से हजारों की संख्या में प्रवासी कार्यकर्ता बंगाल के स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दिन रात बूथ और पन्ना स्तर पर मेहनत कर रहे हैं।

गृह मंत्री अमित शाह ने बंगाल के लिए टारगेट तय किया है 170 इसके पीछे का उनका अपना तर्क है। उन्होंने एक इंटरव्यू में पूरे आत्मविश्वास से कहा कि 2 से हम 77 पर पहुंचे थे तो आप तय कीजिए 77 से कहां पहुंचेंगे? पीएम नरेंद्र मोदी की रैली में जुटने वाली भीड़ हो या योगी आदित्यनाथ की सभा में बंगाली जनता का जोश तस्वीरें और वीडियो बहुत कुछ कह रहे। अमित शाह की रणनीति और टारगेट के बारे में हम सभी जानते हैं कि उनके दिमाग में यूं ही कोई आंकड़ा नहीं आता। बंगाल अब तक बीजेपी के लिए कमजोर कड़ी रहा है लेकिन पिछले चुनावों में मिली 77 सीटों ने इस बार आत्मविश्वास बढ़ाया और यही वजह है कि संघ से लेकर बीजेपी का पूरा कैडर जी तोड़ मेहनत कर यह सुनिश्चित करने में जुटा है कि ममता का किला भेदा जा सके।

भय पर भरोसा भारी पड़ता दिख रहा है, मतदान केंद्रों पर खामोश भीड़ टीएमसी के लिए शुभ संकेत तो नहीं लग रही है, जहां टेबल पर कभी टीएमसी के कार्यकर्ताओं का कब्जा होता था वहीं इस बार कई बूथों पर टीएमसी के टेबल पर बैठने वाले कार्यकर्ता तक नदारद हैं। पहला फेज बहुत हद तक यह तय कर देगा कि बंगाल बदलाव के लिए वोट कर रहा या ममता पर भरोसा जता रहा है हालांकि यह तय है कि यह उत्सुकता, आक्रामकता और वोटिंग के लिए ऐसी आपाधापी किसी के लिए खुशखबरी तो किसी के लिए बुरे संकेत की शुरुआत है।

अगर तथ्यों और जमीनी तस्वीर पर नज़र डालें तो पश्चिम बंगाल में पहले चरण की 152 सीटों पर हो रहे चुनाव में  करीब 3.60 करोड़ मतदाता वोट डालने के पात्र हैं और चुनाव आयोग ने हालात की संवेदनशीलता को देखते हुए पूरे राज्य में रिकॉर्ड 2,450 कंपनियां केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती की है। 8,000 से अधिक बूथों को अत्यधिक संवेदनशील माना गया है, यानी इस बार व्यवस्था भी असाधारण है और माहौल भी। मतदान का ट्रेंड भी बहुत कुछ कह रहा है—सुबह 9 बजे तक 18.76%, 11 बजे तक 41.11%, दोपहर 1 बजे तक 62% और शाम तीन बजे तक 78 फीसदी से अधिक मतदान दर्ज होना साफ संकेत है कि जनता चुप जरूर है, लेकिन घरों में नहीं बैठी।  तुलना करें तो 2021 में पश्चिम बंगाल के पहले चरण में लगभग 84.6%  मतदान हुआ था। बूथों पर लगी लम्बी कतारें यह बता रही कि यह अप्रत्याशित है और वोटिंग परसेंटेज पिछले चुनावों के सभी रिकॉर्ड तोड़ सकता है।

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