राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में फरवरी के अंतिम हफ्ते में हुए दंगों की परतें अब खुलने लगी है। इस दंगे के पहले और बाद यूँ तो कई बयान चर्चा का विषय रहे और जम कर आरोप-प्रत्यारोप का दौर राजनीतिक दलों के बीच भी चला लेकिन जब इस दंगे के मास्टरमाइंड ताहिर हुसैन से सख्ती बरती गई तो वह गिरफ्तारी के चार महीने बाद टूट गया। उसने अब कबूल कर लिया है कि दिल्ली दंगों में न सिर्फ उसका हाथ है, वह मास्टरमाइंड है बल्कि उसने इसके लिए तैयारी काफी पहले शुरू की थी।

आम आदमी पार्टी के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन ने अपने कबूलनामे में कई सनसनीखेज खुलासे किए हैं। दिल्ली पुलिस की जांच रिपोर्ट में बताया गया है कि उसने अपने कबूलनामे में यह स्वीकार किया है कि जब वह 2017 में पार्षद बना तब से ही उसके मन मे यह था कि अब वह राजनीति और पैसे के भडास हिंदुओं को सबक सिखा सकता है। इस कबूलनामे में ताहिर ने यह भी माना है कि उसका साथ खालिद सैफी और पीएफआई ने दिया था।

कबूलनामे के मुताबिक दिल्ली में दंगों की पटकथा धारा 370 हटने के बाद से ही बननी शुरू हो गई थी, इसी बीच राम मंदिर पर फैसला और सीएए कानून ने इस नफरत को और गहरा किया। इसी बीच खालिद सैफी ने ताहिर को भड़काया और उसे अपनी राजनीतिक पहुंच और पैसे का प्रयोग अपने कौम की भलाई के लिए करने को मनाया। ताहिर ने अपने कबूलनामे में कहा कि 8 जनवरी को खालिद सैफी ने मुझे जेएनयू के छात्र नेता उमर खालिद से पीएफआई के दफ्तर में मिलाया था। जहां मारने-मरने को राजी होने की बात कही गई थी। खालिद ने दानिश नाम के एक शख्स का नाम लेते हुए यह भी कहा कि फण्ड का पूरा मैनेजमेंट दानिश ही देखेगा।

खालिद को लोगों को भड़का कर सड़क पर लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। ताहिर से कांच की बोतलें, पेट्रोल, तेजाब और पत्थर ज्यादा से ज्यादा मात्रा में इक्कठा करने को कहा गया। इसी बीच सीएए की आड़ में पहले शाहीनबाग और फिर जगह जगह धरने शुरू कर लोगों को उकसाया जाने लगा। उसके बाद 4 फरवरी को खालिद से मुलाकात में यह हुआ कि ट्रम्प के भारत आने के वक़्त ही कुछ बड़ा करना है जिससे सरकार घुटने टेक दे और इनकी मंशा सफल हो जाए।

सब तय हो गया और सभी अपने मकसद में जुट गए। कबाड़ी से बोतलें खरीदी गई, गाड़ियों में भरकर पेट्रोल लाया गया, इसके बाद मजदूरों को इस काम के लिए तैयार किया गया।इसी बीच 17 फरवरी को ट्रम्प के दौरे के दौरान ही खालिद ने लोगों से सड़क पर उतरने की अपील की जिसके बाद माहौल बिगड़ता गया और अंततः 24 फरवरी को इस वारदात को अंजाम दिया गया। इस मामले में ताहिर ने अपने भाई सही एक दर्जन से अधिक लोगों के नाम लिए और यह भी बताया कि पुलिस का ध्यान भटकाने के लिये उसने घर और गली के सीसीटीवी के न सिर्फ तार काटे बल्कि परिवार को दूसरी जगह शिफ्ट किया और फ़ोन भी करता रहा।

ताहिर के कबूलनामे के बाद यह बिल्कुल साफ है कि भीड़ इसका हिस्सा और मूकदर्शक थी। असली खेल ताहिर हुसैन, खालिद सैफी और उमर खालिद ने रचा था। हिंदुओं के लिए उनकी नफरत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पत्थर फेंकने वालों, गोली चलाने वालों और तेजाब फेंकने वालों से साफ कहा गया था कि इसका इस्तेमाल दूसरे कौम और पुलिसवालों पर ही करना है। ध्यान रहे मुस्लिम समाज के किसी व्यक्ति को नुकसान न हो। इस कबूलनामे के बाद देश के गद्दारों का न सिर्फ चेहरा बेनकाब हुआ है बल्कि झूठे आरोप लगा कर मगरमच्छ के आंसू रोने वाले भी एक बार फिर बेनकाब हुए हैं।