बिहार विधानसभा चुनावों के लिए नामांकन और प्रचार का सिलसिला अब जोर पकड़ने लगा है। अलग-अलग दल और नेता एक दूसरे पर आरोपों के शब्दबाण चला रहे हैं। खास बात यह है कि दावों और कागजों पर मिली उपलब्धि के भरोसे ही इस बार चुनावी वैतरणी पार करने की तैयारी है।
राजद के पास जहां सरकार की विफलता को बताने का मौका है वहीं सरकार के पास अपनी उपलब्धि बताने से कहीं ज्यादा लालू-राबड़ी के 15 सालों के शासन की विफलता का ही सहारा है।
प्रचार के क्रम में आज नीतीश कुमार की पहली रैली बाँका में आयोजित हुई। आज दिन भर में वह कुल ऐसी चार रैलियां करेंगे। इसके अलावा वर्चुअल तरीके से भी विधानसभावार वह कार्यकर्ताओं और जनता को संबोधित करेंगे।
वहीं दूसरी तरफ आज नेता प्रतिपक्ष और महागठबंधन के सीएम उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने राघोपुर सीट से नामांकन भरा। इस दौरान उन्होंने सरकार पर विफल रहने का आरोप भी लगाया।
अब आते हैं मुद्दे की बात पर, नीतीश कुमार ने आज अपनी रैली में कहा कि कोरोना काल के दौरान 22 लाख लोग वापस बिहार लौटे।
उन्होंने यह भी कहा कि इन लोगों को 14 दिन क्वारंटाइन करने के दौरान एक व्यक्ति पर 5300 रुपये खर्च किए गए? हो सकता है लेकिन 5300 रुपये के ख़र्च का फायदा कितने लोगों को मिला वह अगर 22 लाख में से एक लाख लोगों से भी पूछ लिया जाता तो स्पष्ट हो जाता।
साथ ही उन 22 लाख लोगों के रोजगार और दोबारा पलायन रोकने के लिए क्या किया गया और बाकी 15 सैलून के तथाकथित विकास में इसकी नौबत क्यों आई अगर सीएम यह भी साथ के साथ बता जाते तो शायद यही बड़ी उपलब्धि होती?
इसके अलावा सीएम सात निश्चय के पूरा होने की बात को भी अपनी उपलब्धि मानते हैं। अगर किसी भी गांव में हम जाएं तो यह समझना बहुत मुश्किल नही है कि सात निश्चय के तहत नल-जल योजना, पक्की गली-नाली योजना का क्या हश्र है।
अगर वाकई सरकार की योजनाएं सफल हुईं है तो फिर वह खबरें झूठी थीं जिनमे हर दिन किसी न किसी वाटर टैंक के भरभरा कर ढहने की बात आम थी। दोनो चीजें सच नही हो सकती? इसके अलावा हर साल बाढ़ को रोकने के लिए क्या उपलब्धि हासिल हुई यह भी बताया जाना चाहिए था।
कुल मिलाकर देखें तो इन चुनावों में कागज पर मिली उपलब्धि और लालू-राबड़ी के 15 साल के जंगलराज का ही सहारा है।
