बनारस में लगातार मंदिरों-मस्जिदों के बनने और विध्वंस से हर रोज कुछ नया टूट और उभर रहा है। कहा जा रहा है कि बस कुछ महीनों में बाबा विश्वनाथ की नगरी की विरासती दरख्तें काट दी गई।
काशी के टूटने और बिखरने से उड़ती धूल से ही फिल्म ‘ताम’ निकलती है जो ओटीटी पर देखने को मिलेगी और काशी के क्यूटो(Kyoto) बनने की बेरहम सच को सामने लाती है। बाबा विश्वनाथ की काशी के सालों पुराने अस्तिव को खत्म होने के सफर को स्क्रीन पर लाने वाले का नाम भी विश्वनाथ है जिन्होंने इस फिल्म का निर्देशन किया है।
अविमुक्त फिल्मस के बैनर तले बनी फिल्म ‘ताम’ का नाम संस्कृत के तमस यानी तामसी शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है अंधकार।तामसी प्रवृति राक्षस की बताई जाती है जो सिर्फ विनाश करता है।
फिल्म आधे घंटे की ये शॉर्ट मूवी है जो फिल्म इंस्टीट्यूट से पास आउट विद्यानाथ भारती द्वारा निर्देशित है। कलाकारों की बात करें तो में बीएनए लखनऊ से पास आउट अमित श्रीवास्तव, अभिनेता राघवेंद्र पाठक, सैयद इकबाल अहमद और गौरव सिंह ने अभी नहीं किया है। गौरव सिंह ने लेखन और निर्देशन में भी बड़ी भूमिका निभाई हैं।
फिल्म ‘ताम’ का विषय बड़ा है जिसे डायरेक्टर विश्वनाथ तिवारी हर उस बनारसी की कहानी बताते हैं जिसने क्यूटो के लिए अपने घर को कुर्बान किया है। फिल्म की कहानी ऐसे ही एक परिवार की है, जो पुरखों के बनाए घर में रहता है, घर की चारदीवारी में बचपन से जवानी और बुढ़ापा देखने वाले सदस्य इस सदमें को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हो पाते।
कहानी को निर्देशक ने लाइव फुटेज के बीच ड्रामा में पिरोते हुए बताते हैं कि काशी से क्यूटो के सफर को फिल्म में दर्शाना आसान नहीं था क्योंकि फिल्म के लिए फाइनेंस सबसे बड़ी बाधा थी। लेकिन बाबा विश्वनाथ की कृपा और टीम की दृढ़ता ऐसी थी कि ताम बनकर तैयार है। “कोरोना और प्रशासन के प्रतिबंधों के बीच इस फिल्म को रियल लोकेशन में शूट कर पाना एक असंभव काम जैसा था।
किसी ने भी इस बदलते काशी को दिखाया नहीं था। बाकी निर्देशकों के लिए काशी का मतलब घाट और गंगा आरती तक सीमित रह गया है। इसीलिए इन चुनौतियों के बावजूद इस फिल्म को बनाना एक जरूरत बन गया था जिसे हमने पूरा करने की कोशिश की है” वह कहते हैं। यह एमएक्स प्लेयर पर और हंगामा प्ले के अलावा यू-ट्यूब पर भी देखने के लिए उपलब्ध है।
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