राहुल गांधी और पीएम मोदी की तुलना अक्सर एक दूसरे से की जाती है। दोनो ही बड़े नेता हैं। दोनो ही अपने अपने दलों के सर्वमान्य नेता हैं। इसके बावजूद कहीं न कहीं दोनो में कुछ मसलों को लेकर एक बड़ा अंतर जरूर है।
2018 में तीन राज्यों में कांग्रेस को बेशक जीत मिली हो और अध्यक्ष के तौर पर राहुल श्रेय ले भी रहे हैं लेकिन इसके बावजूद यहां समझने की जरूरत है कि यह नतीजे कांग्रेस की जीत के नही हैं
परिवारवाद का आरोप लगता आया है। घोटाले के आरोप लगे। आपातकाल कांग्रेस के ही शासनकाल में लगा, सिख विरोधी दंगे हुए। इंदिरा और राजीव ने अपनी जान गंवाई। इसके बावजूद आज अगर यह पार्टी खड़ी है और सिमटती नजर आने के बावजूद बीजेपी को टक्कर देने का दम्भ भरती नजर आ रही है तो यकीन मानिए कुछ तो खास इसमे जरूर है।
सत्ता के खिलाफ एन्टी इंकमबेंसी, मोदी की आरक्षण के खिलाफ नीति, स्वर्ण विरोधी नीति कहना ज्यादा जायज है। इसके अलावा किसानों की दुर्दशा, बेरोजगारों की आशा और युवाओं का पलायन।
बीजेपी और कांग्रेस दोनो के लिए यह चुनाव नाक का सवाल थे। 2019 से पहले इसे सत्ता का सेमीफाइनल माना जा रहा था। इन चुनावों में सत्ता विरोधी लहर के हावी होने की संभावना प्रबल थी। यह नजर भी अब आ रही है।
सरकार द्वारा लागू किये गए टैक्स के विरोध में हज़ारों लोग एकदम से जुट गए और देखते ही देखते हालात बिगड़ने लगे। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि सरकार को 500 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लेना पड़ा।
कांग्रेस की तरफ से जहां मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रचार की अगुवाई कर रहे हैं वहीं राजस्थान में सचिन पायलट के भरोसे कांग्रेस नजर आ रही है। हालांकि अभी तक किसी भी नेता को कांग्रेस ने सीएम का दावेदार घोषित नही किया है।