आज सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि व्यावसायिक अभिव्यक्ति—जैसे स्टैंड‑अप कॉमेडी या किसी कॉमिक के माध्यम से की गई बातें—पर “रामज़ानी आज़ादी” नहीं मिली हुई है। कोर्ट ने कहा, जब कोई व्यक्ति अपनी बात का व्यापर करता है, तो उसे समुदाय की भावनाओं का भी ख्याल रखना होगा।
कोर्ट की टिप्पणी विशेष रूप से समय रैना और अन्य कॉमिक्स के खिलाफ उन चुटकुलों के मामले में आई, जिनमें विकलांग व्यक्तियों का मज़ाक उड़ाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह रुख अपनाया कि व्यावसायिक मंच पर किए गए कटाक्ष या व्यंग्य, संवैधानिक तौर पर संरक्षित स्वतंत्रता की व्यापक सीमा में नहीं आते — खासकर जब इससे किसी कमजोर वर्ग की भावनाएं आहत होती हों।
इस बयान से एक संदेश साफ हो गया है: “कॉमेडी या कॉमिक्स—जब अर्थ कमाने का माध्यम बनती है—तो उसमें सामाजिक उत्तरदायित्व का भी पालन होना ज़रूरी है।” संविधान बोलने की आज़ादी देता है, लेकिन यह अपवाद‑रहित नहीं है।
