पूंजीपतियों और सरकार की मिलीभगत के आगे गरीब किसान की एक नही चलती और वह थक हार कर बैठ जाता है। साथ ही जब स्थित्ति बद से बदतर होती है तो उसके पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नही होता।
दिल्ली में तमिलनाडु से आकर किसान 41 दिन तक धरने पर बैठें और कोई न सुने तो यह दुर्भाग्य ही है। उनकी मांग भी कोई बहुत बड़ी नही थी, बस ऋण माफी और पटवन के लिए उचित पानी की मांग कर रहे थे।
कृषि के लिए पानी की समुचित व्यवस्था आज भी नही है। सरकार ट्यूबवेल लगवाने या पम्प सेट खरीदने के नाम पर सब्सिडी देने की बात करती है, देती भी है लेकिन किसे यह नही पता क्योंकि जिन्हें यह मिलता है वह इसके वाजिब हकदार होते ही नही!
उस देश की महानता पर जहां हज़ारों, करोड़ों लेकर देश से भाग जाने वाले लोग सुरक्षित हैं और महज कुछ हजार का कर्ज लेने वाला किसान कर्ज न लौटाने की स्थिति में ट्रेक्टर से कुचल कर मार दिया जाता है या भ्रष्ट सरकारी कार्यप्रणाली से तंग आकर आत्महत्या कर लेता है?