उत्तर प्रदेश में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर बसपा अध्यक्ष मायावती ने अपना रुख पहले ही साफ करते हुए कह दिया है कि प्रदेश में वह किसी के साथ गठबंधन में नहीं है। यहां तक कि पंजाब में होने वाले चुनावों को लेकर शिरोमणि अकाली दल के सिवा वह अन्य किसी भी प्रदेश में किसी भी दल के साथ नहीं जुड़ी हैं।

दरअसल उत्तर प्रदेश में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साथ बसपा के जुड़ने के कयास लगाए जा रहे थे। इसी पर मायावती ने अपना रुख साफ करते हुए बताया कि वह ओवैसी की पार्टी के साथ गठबंधन नहीं कर रही।

हालांकि मायावती ने गठबंधन ना करने का कोई कारण नहीं स्पष्ट किया लेकिन यह अटकलें लगाई जा रही है कि बसपा ने एआईएमआईएम से दूरी सियासी समीकरण को साधने के लिए बनाई है। राजनीति के जानकार यह मानते हैं कि ओवैसी की छवि एक कट्टरपंथी नेता के तौर पर उभरी है और बसपा का उनके साथ जाने पर बहुसंख्यक वोटों का ध्रुवीकरण होने की संभावना है।

ओवैसी के साथ जाने से गैर-मुस्लिम वोटों में बिखराव होगा और इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है। बता दें कि ओवैसी की पार्टी को ‘वोट-कटवा’ पार्टी के तौर पर जाना जाता है। पिछले साल बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम के प्रदर्शन से भाजपा को बड़ा फायदा मिला था जिसके कारण महागठबंधन को नुकसान उठाना पड़ा था।

ओवैसी ने ओमप्रकाश राजभर के ‘भागीदार संकल्प मोर्चा’ के साथ आकर उत्तर प्रदेश में 100 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने की बात कही है। वहीं दलित वोटों को देखते हुए चंद्रशेखर की ‘आजाद समाज पार्टी’ से गठबंधन की चर्चाएं है।

एआईएमआईएम प्रमुख असुदुद्दीन ओवैसी द्वारा मुस्लिम और दलित वोटरों में सेंध लगाने के क्रम में बसपा के किनारा करने के बाद वह आजाद समाज पार्टी के द्वारा दलित और मुस्लिम वोटरों के बीच पैठ बनाने की योजना कर रहे हैं।