सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार के दिन उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश देते हुए कहा कि सीएए के खिलाफ प्रदर्शनकारियों को भेजे गए पुराने नोटिस के ऊपर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू न करें। हालांकि कानून के नियमों के मुताबिक और नए नोटिस के ऊपर प्रदेश सरकार उचित कार्रवाई कर सकती है।
यह कार्रवाई प्रदर्शन के दौरान हुए पब्लिक प्रॉपर्टी के नुकसान के संदर्भ में किया जाना था। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और एम आर शाह की पीठ ने यह फैसला सुनाया कि सरकार पुराने नोटिसों के ऊपर कार्रवाई ना बैठाए। हालांकि वह नए नियमों के मुताबिक कदम उठा सकती है।
बता दें कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ सड़कों पर भारी प्रदर्शन देखने को मिला था जिस दौरान कई पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाया गया था। इसे लेकर प्रदेश की सरकार ने तेवर कड़े करते हुए पकड़े गए आरोपियों से सारा जुर्माना वसूलने की बात कही थी।
दिसंबर 2019 तक चार जिलों के अधिकारियों ने करीब 130 लोगों को नोटिस भेजकर 50 लाख तक का जुर्माना भरने को कहा था। उत्तर प्रदेश असेंबली में मार्च 2021 में ‘उत्तर प्रदेश रिकवरी टू द डैमेजेस ऑफ पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टी बिल’ पास किया गया जिसके तहत प्रदर्शनकारियों द्वारा किसी भी तरह की पब्लिक या प्राइवेट प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाते हुए पकड़े जाने पर 5,000 से लेकर 1 लाख तक के जुर्माने का या कैद का प्रावधान बनाया गया।
कोर्ट की सुनवाई परवेज आरिफ टीटू द्वारा दायर की गई याचिका के ऊपर थी जिसमें जिला के अधिकारियों द्वारा प्रदर्शनकारियों को भेजे गए नोटिस और प्रदेश सरकार से उसके ऊपर जवाब देने के लिए कहा गया था। याचिका में कहा गया कि ये नोटिस बहुत ही मनमाने ढंग से भेजे हुए थे, जिसमें एक नोटिस ऐसे व्यक्ति को भेजा गया था जिसकी मृत्यु 94 वर्ष की उम्र में 6 साल पहले ही हो चुकी थी।
ऐसे ही दो और नोटिस 90 साल से ऊपर के दो आदमियों को भेजा गया था। पिछले साल के जनवरी 31 को उच्च न्यायपालिका ने राज्य सरकार को नोटिस भेजकर याचिका के ऊपर जवाब तलब किया था। टीटू द्वारा दायर याचिका में कहा गया कि राज्य सरकार ने सीएए को लेकर प्रदर्शन के दौरान हुए पब्लिक और प्राइवेट प्रॉपर्टी की क्षति की पूर्ति के लिए भेजे जाने वाले नोटिसों की प्रक्रिया को देखने के लिए एक अधिकतम जिला अध्यक्ष की नियुक्ति की जबकि सुप्रीम कोर्ट के नियम के मुताबिक रिटायर हो चुके जज ऐसे मामलों को देखते हैं।
यह भी कहा गया कि कई नोटिस ऐसे लोगों को भी भेजे गए हैं जिनकी ना कोई आपराधिक पृष्ठभूमि रही है, ना ही उनके खिलाफ कोई मामला या एफआईआर दर्ज पाया गया है। यह आरोप लगाया गया कि प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार अपने मुख्यमंत्री के वादे ‘पब्लिक और प्राइवेट प्रॉपर्टी की क्षती की पूर्ति’ के बजाय ‘राजनीतिक कारणों से अल्पसंख्यकों द्वारा बदला निकालने की भावना’ की ओर ज्यादा बढ़ती दिखाई दे रही है।
मामले को दो सप्ताह के बाद आगे की सुनवाई के लिए बढ़ा दिया है।
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