बिहार विधानसभा चुनावों की तारीखों के एलान के बाद तीन दिनों का वक़्त बीत चुका है। दल तैयारियों में लगे हैं, मुद्दे और संभावित उम्मीदवार, घोषणापत्र और वादों की लिस्ट तैयार होने लगी है हालांकि सीट बंटवारे की वजह से पेंच हर तरफ फंसता दिखाई दे रहा है। एक तरफ जहां महागठबंधन में मुश्किलें उपेंद्र कुशवाहा और कांग्रेस की वजह से बढ़ी हुई हैं वही एनडीए की तरफ से लोजपा ने मोर्चा खोल रखा है।
माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस और लोजपा दोनो अपने अपने गठबंधनों से मुक्त अकेले चुनाव लड़ने का एलान कर सकते हैं। लोजपा और कांग्रेस दोनो की ही समस्या एक जैसी है। दोनो ही दल अपने अपने गठबंधनों में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। सीट बंटवारे पर अगर बात नही बनी तो आने वाले एक दो दिन में बिहार में राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ सकते हैं।
माना जा रहा है कि राजद की तरफ से कांग्रेस को 65 से 70 सीटें देने की बात तय हुई है। वहीं लोजपा पहले की तरह 43 सीटों पर अड़ी है। हालांकि जदयू जहां लोजपा को इतनी सीटें देने के मूड में नही वहीं राजद भी ज्यादा से ज्यादा सीटों पर खुद चुनाव लड़ने की पक्षधर है।
पहले माना जा रहा था कि कांग्रेस पिछली बार मिली 41 कि जगह इस बार 65 सीटें मिलने से खुश होगी। हालांकि ऐसा नही हुआ। वहीं जदयू ने लोजपा को मनाने की जिम्मेदारी अब बीजेपी पर छोड़ दी है। अगर बात नही बनी तो चुनावों में मतों का ध्रुवीकरण और नतीजों के समीकरण बदलने का पूरा अनुमान लगाया जा सकता है।
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