बिहार में चुनावी सरगर्मियों के बीच राजनीतिक तपन तेजी से बढ़ रही है। एक तरफ जहां सरकार वादे, यादें, शिलान्यास और उद्घाटन से जनता को विकास और अपनी कामयाबी की बातें बताने में जुटी है वहीं दूसरी तरफ विपक्ष लगातार हमलावर है। खास कर कृषि संबंधित बिल ने जैसे विपक्ष को संजीवनी दे दी है और इसको लेकर सरकार को लगातार तीखे सवालों का सामना करना पड़ रहा है।
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बिहार चुनावों से पहले जानें किन दलों को मिला नया चुनाव चिन्ह, पप्पू को कैंची तो मांझी को पैन, जानें पूरा ब्यौरा
बिहार विधानसभा चुनावों की तैयारियां जारी है। कहीं एक दूसरे पर जम कर आरोपो के तीर चलाये जा रहे तो कहीं चुनावी बिसात पर ऐसी गोटियां बिछाई जा रही है जिससे जीत में कोई कोर कसर बाकी न रहे। गठबंधन में सीटों के बंटवारे अपर तो नेताओं में टिकट को लेकर उलझन की स्थिति है। इसी बीच चुनाव आयोग ने कुछ दलों को नया चुनाव चिन्ह आवंटित कर दिया है।
बिहार चुनाव- सीट बंटवारे की उहापोह से परेशान दल, संभावित उम्मीदवारों में भी संशय की स्थिति
कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि बिहार विधानसभा चुनाव अपने तय समय पर होंगे। इन चुनावों को लेकर दल और उनके नेता अपनी कमर कसने में कोई कोर कसर नबी छोड़ना चाहते हैं। बागियों को सहारा देने से न तो परहेज़ है न रूठे यारों को मनाने से लेकिन उस बीच एक संकट ऐसा है जो हर दल और गठबंधन के नेताओं में आम है।
इस दिन हो सकता है बिहार विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान, कोरोना काल मे चुनाव कराने वाला पहला राज्य होगा
बिहार विधानसभा चुनावों को लेकर सत्तापक्ष की जिद्द और विपक्ष की चुनाव न कराने की मांग के बीच अगले एक दो दिनों में चुनावों की तारीखों का ऐलान किया जा सकता है। कोरोना संकट के बीच बिहार ऐसा पहला राज्य होगा जहां चुनाव होंगे। माना जा रहा है कि निर्वाचन आयोग 13 सितम्बर को तारीखों का ऐलान कर सकता है। यह अनुमान इसलिए लगाए जा रहे क्योंकि वर्तमान विधानसभा के चुनावी तारीखों का ऐलान भी 9 सितम्बर को हुआ था।
चुनावी चूर्ण बाँटते नीतीश की तस्वीर शेयर कर बोले लालू, वर्चुअल-फर्चुअल नही एक्चुअल में बताओ..
लालू के ट्विटर हैंडल से ट्वीट करते हुए लिखा गया कि 15 वर्षों में क्या-क्या काम किया दिखाओ, वर्चुअल-फ़र्चुअल नहीं ऐक्चूअल में बताओ? इसके साथ ही हैशटैग #Bihar rejectsnitish का भी प्रयोग किया गया।इसी ट्वीट के साथ नीतीश कुमार की एक तस्वीर कार्टून के रूप में साझा की गई। इस तस्वीर में लिखा गया नीतीश का प्रसिद्ध चुनावी चूर्ण।
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बिहार विधानसभा चुनावों की बिसात बिछने लगी है। नफा-नुकसान का आकलन शुरु हो गया है। इसी के साथ पहले शुरु हुआ नेताओं के पाला बदलने का खेल, फिर हुआ दल बदलने का खेल और अब शुरू है आरोप-प्रत्यारोप का दौर। आरोप प्रत्यारोप भी अगर सत्ता पक्ष और महागठबंधन के बीच हो तो शायद इसमें कुछ नया नही माना जाता लेकिन राजनीति में कुछ भी संभव है कि तर्ज पर पहले जहां मांझी, नीतीश के साथ आ मिले वहीं एनडीए के पुराने पार्टनर लोजपा ने मोर्चा खोल दिया।
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बिहार विधानसभा चुनावों को लेकर अब दल और नेता सक्रिय नजर आने लगे हैं। समीकरण साधने के लिए क्या दुश्मन क्या दोस्त सब जायज है। कहीं रूठे यारों को मनाने का क्रम जारी है तो कहीं पाला बदल सुरक्षित हो जाने की जद्दोजहद है वहीं हमेशा की तरह सत्ता पक्ष के तरकश में शिलान्यास, उद्घाटन के साथ हर वर्ग को लुभाने के लिए कुछ न कुछ वादे हैं।
भारत बंद की क्या रही उपलब्धि, नेताओं पर हुए हमले या राजनीतिक दलों की बढ़ती बेचैनी?
हिंसा गलत है लेकिन जिस तरह बिहार में पप्पू यादव और श्याम रजक आज भीड़ के हमले का शिकार हुए। यह सही नही लेकिन यह सोचना होगा कि यह स्थिति क्यों बनी? कौन है जिम्मेदार? इससे पहले एमपी और राजस्थान में भी कई जगह से बड़े नेताओं पर हमले की खबर आ चुकी है। राजनीति बदलेगी, बदलनी पड़ेगी। यही वक़्त की नजाकत है। खैर नजारे हम क्या देखें और दिखाएं यह तो 2019 में ही पता लगेगा।
