पीएम स्वनिधि योजना के अंतर्गत 15 लाख से ज्यादा ऋण आवेदन प्राप्त हुए

आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा पीएम स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि (पीएम स्वनिधि) योजना को लागू किया जा रहा है, जिससे कोविड-19 लॉकडाउन के बाद अपने व्यवसायों को फिर से शुरू करने के लिए 50 लाख स्ट्रीट वेंडर्स को गारंटी मुक्त कार्यशील पूंजी ऋण की सुविधा उपलब्ध कराई जा सके।

उद्योग की आड़ में खो रहे किसान

पूंजीपतियों और सरकार की मिलीभगत के आगे गरीब किसान की एक नही चलती और वह थक हार कर बैठ जाता है। साथ ही जब स्थित्ति बद से बदतर होती है तो उसके पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नही होता।

आत्महत्या में सबसे आगे जवान और किसान, कौन जिम्मेदार

जय जवान जय किसान का नारा दिया गया था तब शायद यह क़तई नही सोचा गया होगा कि देश के यह दो वर्ग आने वाले समय मे आत्महत्या के आंकड़ों में सबसे आगे होंगे।

जब किसानों ने आत्महत्या की जगह चुनी क्रांति की राह

सरकार के खिलाफ लामबंद भी दिख रहे हैं यही वजह है कि साल 2017 में महाराष्ट्र के किसानों की एक बड़ी क्रांति देखने को मिली और विरोध प्रदर्शन का एक लंबा दौर चला।

कभी आत्महत्या करने तो कभी मैला खाने को विवश हुए किसान, यह कैसा विकास

दिल्ली में तमिलनाडु से आकर किसान 41 दिन तक धरने पर बैठें और कोई न सुने तो यह दुर्भाग्य ही है। उनकी मांग भी कोई बहुत बड़ी नही थी, बस ऋण माफी और पटवन के लिए उचित पानी की मांग कर रहे थे।

वो देश जहाँ सबसे ज्यादा महिलाएं करती हैं आत्महत्या

इस रिपोर्ट के अनुसार कैरेबियाई देश गुयाना में महिला आत्महत्या के मामले सबसे ज्यादा दर्ज किए गए। आंकड़ों के मुताबिक यहां प्रति एक लाख लोगों पर 44 लोग आत्महत्या कर रहे हैं।

वह अभिनेता जो किसानों, नौजवानों से कहता है आत्महत्या का ख्याल आए तो मुझसे मिलें

कुछ उदाहरण की बात करें तो पुरानी खबरों से गुजरते हुए एक खबर नजर के सामने आई जिसमे नाना के बारे में लिखा गया था कि वह कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों का हौसला बढ़ाने एक पोस्ट से दूसरे पोस्ट तक घूमे थे। वहीं किसान आत्महत्या पर काम करते हुए उन्होंने निजी रूप से सैकड़ों किसानों के लोन भरे या मदद मांग कर उनकी मदद की

गाजियाबाद- डॉ की पत्नी ने की आत्महत्या

डॉ बेनी सिंह पर काफी कर्ज था और इसी की वजह से उन्होंने सपरिवार आत्महत्या करने की सोची। जहर उन्होंने भी इस्तेमाल किया लेकिन इसका असर उनपर नही हुआ और मामला खुल गया।

किसानों की लाश पर राजनीति कब तक

कर्ज़ माफी, सब्सिडी, खाद पानी हर तरह से यहां तक कि फसल नुकसान से लेकर हर वह कड़ी इस वादे का हिस्सा होती है जिससे किसान मोहित हो सके लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात पर आकर खत्म हो जाता है।

बुंदेलखंड जहां वादों की बरसात में सिर्फ राजनीति की फसल लहलहाती है, किसानों की नही

बुंदेलखंड के लिए हर बार चुनाव से पहले लंबे चौड़े वादे हर दल द्वारा किये जाते हैं लेकिन इस इलाके की तकदीर बदलने के मकसद से आज तक ऐसा कुछ होता नही दिखा जिससे उम्मीद जगी हो।

गुजरात मे यह कैसा विकास, किसानों की कब्रगाह बनता सौराष्ट्र

गुजरात के शहर अहमदाबाद से करीब 400 किलोमीटर दूर सौराष्ट्र के इलाके में विकास की नही तंगहाली की कहानियां गूंजती हैं। किसानों की आत्महत्या की खबर यहां आम बात है।

कंक्रीट के जंगलों में खो रही जीने की राह

एक तरफ हम विकास की अंधी दौड़ में शामिल होकर अपनी संस्कृति और संस्कार भूलते जा रहे हैं वही छोटी-छोटी परेशानियों से तंग आकर आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं।

ऐसा देश है मेरा, जहां करोड़ो लेने वाला सुरक्षित है और अन्नदाता कर्ज के बोझ से आत्महत्या कर रहा है

उस देश की महानता पर जहां हज़ारों, करोड़ों लेकर देश से भाग जाने वाले लोग सुरक्षित हैं और महज कुछ हजार का कर्ज लेने वाला किसान कर्ज न लौटाने की स्थिति में ट्रेक्टर से कुचल कर मार दिया जाता है या भ्रष्ट सरकारी कार्यप्रणाली से तंग आकर आत्महत्या कर लेता है?