आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नही है

आज जब भी हम अपने आसपास होने वाली घटनाओं या खबरों के बीच से गुजरते हैं तो हर दिन कहीं न कहीं, किसी न किसी के आत्महत्या की खबर उसमे जरूर होती है। इससे प्रभावित तो हर वर्ग है लेकिन खास कर युवाओं में यह प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है।

कंक्रीट के जंगलों में खो रही जीने की राह

एक तरफ हम विकास की अंधी दौड़ में शामिल होकर अपनी संस्कृति और संस्कार भूलते जा रहे हैं वही छोटी-छोटी परेशानियों से तंग आकर आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं।

घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं तेजी से लगा रही हैं मौत को गले

भारत में बेटियों को बोझ मानने वाले लोग नही हैं, डरने वाले लोग हैं। उनका डर ऐसे माहौल को देखते हुए स्वभाविक भी है। आज के तथाकथित समाज मे भी ऐसे पैसे और दहेज के भूखे हैं जो हर तरफ से परिपूर्ण होने के बावजूद दहेज के लोभ से खुद को दूर नही कर पा रहे

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, लेकिन दहेज न दिया तो उनका सुख भूल जाओ?

जब इस नारे को प्रचारित करते ब्रेक के बाद कोई समाचार प्रसारित होता है तो उसमें कोई न कोई, कहीं न कहीं की एक घटना ऐसी जरूर होती है जिसमे किसी न किसी महिला द्वारा आत्महत्या करने की बात बताई जाती है?

आत्महत्या के मामलों को रोका जा सकता, पढ़ें कैसे

सिर्फ भारत की ही बात करें और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो एक दशक के अंदर आत्महत्या के मामलों में 22.7 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।

भारत में आत्महत्या के मामले चिंतनीय, क्या हैं कारण

मानसिक और सामाजिक दबाव, सफलता प्राप्त करने की अंधी दौड़ और उसके लिए अपनाए जाने वाले रस्ते इसके लिए सबसे बड़े कारण नजर आते हैं।

बच्चों की जान ले रहे मोबाइल गेम

बच्चों के साथ उचित व्यवहार, देखरेख और उन्हें समझने की जरूरत है। ऐसा न हो मॉडर्न बनने की चाह में गिफ्ट किया गया मोबाइल आपके बच्चे के लिए जानलेवा साबित हो