बिहार विधानसभा चुनावों के दूसरे दौर का प्रचार अब थम चुका है। अब दूसरे चरण में मंगलवार को मतदान होगा। इसके अलावा अब दलों और नेताओं का ध्यान तीसरे चरण की सीटों पर हैं। इन सब के बीच एक बहस यह भी है कि रैलियों में जुट रही भीड़ क्या वोट में तब्दील होगी? क्या भीड़ इस बात की परिचायक है कि सत्ता किसके हाथ होगी?


यकीन मानिए तो नही। बिहार में अब तक रैलियों में जुटी भीड़ के ट्रेंड को देखें तो राज्य में सत्ताधारी एनडीए और महागठबंधन के नेताओं के अलावा भीड़ चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा, पप्पू यादव समेत अन्य नेताओं को सुनने भी खूब उमड़ रही है। ऐसे में भीड़ को या ज्यादा मतदान को अभी से स्पष्ट तौर पर सत्ता विरोधी लहर कहना मुनासिब नजर नही आता है।


तेजस्वी की रैलियों में जुट रही भीड़ के बाबत पूछे जाने पर जदयू प्रवक्ता राजीव रंजन कहते हैं-तेजस्वी यादव की सभाओं में भीड़ का प्रबंधन तो हो रहा है लेकिन वो उन्हें वोट में तब्दील कर पाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं। आधी आबादी ने तेजस्वी यादव को नकार दिया है। 1990-2005 के बीच की जो खौफनाक यादें और जो बिहार का रक्त रंजित अतीत है उससे बिहार आज आगे बढ़ा है।
इसके अलावा चुनावी शुरुआत के बाद से अब तक कई दलों के ऐसे कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं जिसमे पैसे लेकर रैली में आने की बात कबूली गई है। ऐसे में भीड़ को देख मतदाताओं के मूड का अंदाजा लगाना टेढ़ी खीर है।