अमेरिका की H-1B वीज़ा पॉलिसी ने दशकों से दुनियाभर के टैलेंट को सिलिकॉन वैली तक पहुँचाया है। एलन मस्क, सुंदर पिचाई और सत्य नडेला जैसे दिग्गज इसी वीज़ा के ज़रिए अमेरिका पहुँचे और आज टेक्नोलॉजी की दुनिया में बड़ा मुकाम हासिल किया।
लेकिन अब यह “अमेरिकन ड्रीम” महंगा पड़ सकता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 21 सितंबर को इस वीज़ा पर $100,000 (करीब ₹83 लाख) की नई फ़ीस लगा दी, जबकि पहले इसकी लागत केवल $2,000 से $5,000 तक थी।
अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने कहा कि “सभी बड़ी कंपनियां” इस बदलाव के साथ हैं, लेकिन अब शायद 85,000 की वार्षिक सीमा तक वीज़ा जारी न हों, क्योंकि यह “आर्थिक रूप से व्यवहार्य” नहीं रह गया है।
एलन मस्क, जिन्होंने J-1 वीज़ा से शुरुआत की और फिर H-1B पर आए, ने कहा था—
“मैं और SpaceX, Tesla जैसे हज़ारों स्टार्टअप्स के अहम लोग अमेरिका में H-1B की वजह से हैं।” हालांकि बाद में उन्होंने इसे “टूटा हुआ सिस्टम” बताते हुए सुधार की मांग की।
सत्य नडेला और सुंदर पिचाई भी इस वीज़ा से अमेरिका पहुँचे और आज Microsoft व Alphabet के सीईओ हैं। पिचाई ने कहा था—”इमिग्रेशन ने अमेरिका को टेक में विश्व लीडर बनाया है।”
अमेरिकी डेटा के अनुसार, 71% H-1B वीज़ा भारतीयों को मिलते हैं। भारत ने इस फ़ीस वृद्धि को “मानवीय संकट और परिवारों में व्यवधान” बताकर चिंता जताई है और कहा है कि इसके प्रभावों का अध्ययन किया जा रहा है।
