4 जून 2024, जब देश और दुनिया की निगाह भारत के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनावी परिणाम पर थी, दुनिया के तमाम देश अपने आकलन में मोदी की वापसी पर बिना किसी संदेह के मुहर लगा रहे थे। देश की मीडिया भाजपा और एनडीए को प्रचंड बहुमत दे रहे थे। विपक्षी और अन्य राजनीतिक दल जब अंदेशे से घिरे थे, नकारात्मक राजनीति हावी थी, खुद पर शून्य बराबर भरोसा था, ईवीएम पर सवाल थे, डीएम पर सवाल थे, संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल थे, मतदान प्रक्रिया पर सवाल थे और न जाने कितनी नकारत्मक बातें थी वैसे में यह भारत के परिणाम आए। आए भी और सबको चौंका भी गए।
क्यों और कैसे?
जब भारत में यह मनोभाव था कि आएंगे तो मोदी ही वैसे समय में चुनावों के दौरान, हर रैली के दौरान भीड़ , भसड़ और भौकाल दिखाने वाली यूपी की जनता को अचानक न जाने कौन सा दिवास्वप्न आया जिसने नतीजे बदल डाले।
यूपी को डिफेंस कॉरिडोर, लाखों का इन्वेस्टमेंट, करोड़ों का इन्फ्रास्ट्रक्चर और न जाने क्या क्या योगी मोदी ने दिए।
न जाने कितने वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट वायरल और फेमस हुए।
न जाने कितनों को मकान और दुकान मिले, रोजगार मिले।
न जाने कितने पेटियों में बंद अफसानों के सपने स्वीकार हुए।
न जाने कितने स्व रोजगार से जुड़े, आत्मनिर्भर बने।
न जाने कितनों को दंगा मुक्त और भयमुक्त वातावरण मिला।
न जाने कितनों को पुलिस की तानाशाही से मुक्ति मिली।
न जाने कितने एक्सप्रेस वे और रोड का जाल बना।
फिर भी यूपी वालों ने लाल टोपी के गुंडाराज को चुना।
यूपी से यह अपेक्षित नहीं थी, अब चुना है तो भुगतना भी चाहिए। योगी आदित्यनाथ जी के शासन और विकास मॉडल पर सबसे ज्यादा भरोसा था। यह अपेक्षित नहीं था लेकिन शायद आपकी जनता को हिंदुत्व से ज्यादा टोपी प्यारी है।
राम मंदिर से ज्यादा बाबरी के विध्वंसक प्यारे हैं। शांति से ज्यादा शांतिदूत प्यारे हैं। मुझे अब भी उम्मीद है। मोदी के लिए निराश हूं, योगी जी से बहुत ज्यादा भरोसा था वहां से उससे कहीं ज्यादा निराशा हाथ लगी।
51 लोकसभा पर नजर थी कुछ दिन, सबको बहुत भरोसा था लेकिन अचानक सब बदल गया। यह खल रहा है। हम जीतेंगे वाली बात, हम हार गए तक पहुंच गई। महाराज जी इसका निदान करें। आज मोदी जी से नजर मिलाने की हिम्मत कम से कम यूपी में तो नहीं है।
मतदाताओं का तो क्या ही कहें शब्दों की सीमा है। वरना खुल कर लिख आते। सोशल मीडिया पर सवाल खुद लोग उठा रहे हैं, मजाक और मीम भयंकर शेयर और ट्रेंड में रहे वही देखिये और इस पीड़ा को समझिये।
किसी भी मोदी फैन के लिए यह आंकड़े पीड़ादायक हैं लेकिन सबसे अच्छी बात है कि इन आंकड़ों से बीजेपी सबक लेगी और उन बड़े जातिवादी नेताओं, दलबदलू नेताओं को तरजीह कितनी देनी है यह फिर सोचेगी। साथ ही प्रचार प्रसार और अपने निकम्मे आईटी सेल और सोशल मीडिया के अंतर पर विचार करेगी। ऐसी उम्मीद है।
नैरेटिव इतना भी खतरनाक नहीं था जो तोडा न जा सके लेकिन दलाली हावी रही उम्मीद है इस्पे बड़ा आत्मचिंतन होगा। इतना तय है मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा बड़ी सर्जरी से गुजरने वाली है यही एकमात्र रास्ता भी है।
Note- यह लेखक के अपने विचार हैं