कोरोना काल शुरू होने के बाद से लेकर अभी तक बिहार में पहली बार चुनाव होने हैं। इसके लिए निर्वाचन आयोग ने अलग से दिशा-निर्देश जारी किए हैं। हालांकि हेलीकॉप्टर, चुनावी रैली और भीड़ देखने के आदि मतदाताओं और उनके सामने गरजते वादे-इरादे दिखाते नेताजी के लिए यह चुनाव अलग तरह की चुनौतियां लेकर आया है। उम्मीदवार अब स्थानीय लोगों के नंबर और फेसबुक आईडी ढूंढने में लगे हैं। इसके लिए कुछ कंपनियों की सेवाएं भी ली जा रही है।
ग्राउंड लेवल पर पकड़ रखने वाले नेताजी इस बार चुनाव के बदले अंदाज़ और तरीके से पिछड़ते नजर आ रहे हैं। कई उम्मीदवार तो सोशल मीडिया पर मौजूद तक नही थी। टेक फ्रेंडली होना तो दूर लाइव मीटिंग और लोगों से जुड़ने की भी जानकारी न होना ऐसे नेताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
अब जब उम्मीदवारों के नाम का एलान हो गया और यह साफ है कि बिना सोशल मीडिया के इस बार बेड़ा पार होना कठिन है तो दिल्ली से लेकर दूसरे शहरों से सोशल मीडिया एक्सपर्ट की सेवाएं ली जाने लगी हैं।
खास बात यह है कि जनसंपर्क में 5 लोगों से ज्यादा की अनुमति नही है।
ऐसे में डोर टू डोर जाने से अच्छा सोशल मीडिया को माना जा रहा है। ख़बरो और मीडिया रिपोर्ट के साथ कुछ उम्मीदवारों की मानें तो इस बार चुनावी खर्च का 60 फीसदी तक हिस्सा सोशल मीडिया कैंपेन में खर्च किया जाना है।
खास बात यह है कि जहां उम्मीदवार शार्ट वीडियो और ग्राफ़िक्स के जरिये चेहरा चमकाने के प्रयास में लगे हैं वहीं जनता भी इन्हें टूटी सड़कें, पानी, बिजली और बाकी मुद्दों पर टैग कर तस्वीरों के जरिये घेर रही है।
दलों की बात करें तो बीजेपी सोशल मीडिया कैंपेन में सबसे आगे है।
इसके बाद राजद और फिर जदयू की बारी आती है। हालांकि इन्ही दलों के उम्मीदवारों की बात करें तो कहानी कुछ अलग ही है। ज्यादातर उम्मीदवारों के 3 से 4 एकाउंट बनें हैं। वेरिफाईड एकाउंट न होना लोगों के मन मे संशय को बढ़ा रहा है साथ ही कई तो ऐसे पेज है जहां न के बराबर पोस्ट या अपडेट्स हैं।
ऐसे में देखना है कि यह सोशल मीडिया पर लड़ा जाने वाला चुनाव किसके लिए कैसा साबित होता है।
