बिहार विधानसभा चुनावों के बीच अब प्रचार तेज हो गया है। हर दल अब जनता के बीच अपने मुद्दे, वादे और इरादे बताने के लिए शीर्ष नेताओं की एक बड़ी फौज चुनावी रण में उतार चुके हैं। एनडीए के पास जहां बताने के लिए 15 साल में उनके किये गए काम हैं, दिखाने के लिए पीएम मोदी और नीतीश का चेहरा है वहीं डराने के लिए लालू-राबड़ी के तथाकथित जंगलराज की बातें हैं।
महागठबंधन की बात करें तो इसकी अगुवाई राजद और तेजस्वी करते नजर आ रहे हैं। महागठबंधन के पास न मोदी जैसा फेस है न बीजेपी जैसे नेताओं की बड़ी फौज बावजूद इसके तेजस्वी बीस दिखाई दे रहे हैं।
उनकी रैलियों में उमड़ रही भीड़ इस बात की तस्दीक कर रही है। खास बात यह है कि अभी से चंद दिनों पहले तक तेजस्वी बाढ़ और कोरोना जैसे मुद्दों पर सरकार को घेर रहे थे लेकिन अब उनकी रणनीति में बदलाव दिख रहा और अब उन्होंने बेरोजगारी पर तीखे सवाल पूछने शुरू किए हैं। साथ ही पहली कैबिनेट बैठक में 10 लाख नौकरियों के वादा भी किया है।
दूसरी तरफ महागठबंधन के सहयोगी दल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले राहुल गांधी बिहार चुनावों से फिलहाल दूर-दूर हैं। उनकी रैलियां प्रस्तावित हैं लेकिन जिस तरह के मुद्दों को लेकर वह केंद्र और मोदी पर हमलावर हैं उससे एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं।
राहुल ने आज अपने संसदीय क्षेत्र वायनाड में चीन के मुद्दे को सबसे बड़ा बताया जबकि अन्य मुद्दों पर बहुत ज्यादा नही बोले। वह लगातार चीन के साथ सीमा विवाद के मुद्दे पर पीएम को कटघरे में खड़े करते रहे हैं।
अब यह मुद्दा गलत क्यों है? थोड़ा पीछे चलते हुए अगर 2019 के लोकसभा चुनावों पर नजर डालें तो राहुल ने राफेल में घोटाले का मुद्दा उठाया जबकि इकॉनमी और बेरोजगारी उनके एजेंडे से दूर रहे। इसका नुकसान कांग्रेस को कहीं न कहीं उठाना पड़ा।
वैसे ही बिहार जहां विकास, बाढ़, बेरोजगारी जैसे कई अहम मुद्दों के साथ पलायन, उद्योग और कई मुद्दे हैं वैसे में चीन के मुद्दे को उठाना समझ से परे है। खास कर तब जब मीडिया रिपोर्ट्स और ख़बरों के माध्यम से यह साफ है कि सेना चीन को माकूल जवाब दे रही है।
देखना है बिहार में एंट्री के बाद राहुल के सुर बदलते हैं या वह अपने पुराने स्टैंड और उनके मुताबिक के जरूरी मुद्दों पर ही कायम रहते हैं।
