कांग्रेस ने सपा-बसपा पर दबाव बनाने के मकसद से दोनों सीटों पर सपा प्रमुख अखिलेश के मना करने के बावजूद प्रत्याशी खड़े किए। इसके पीछे मकसद यह था कि या तो सपा झुके और एक एक सीट पर बात बने
राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस की छवि के साथ अपनी छवि को सुधारना है। कार्यशैली में बदलाव लाना है क्योंकि कांग्रेस आज भी नेहरू इंदिरा वाली कांग्रेस है इसमें कुछ भी नयापन नजर नही आता।
कांग्रेस को कोई भी क्षेत्रीय दल तवज्जो देता नही दिख रहा और बीजेपी किसी अन्य दल को अपने सामने तवज्जो दे उनका ग्राफ बढ़ाना नही चाहती है। यही वजह है कि हर जायज-नाजायज मांग मानने के बदले बीजेपी ने डिफेंड करना ही सही समझा है।
प्रशांत किशोर ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने बीजेपी के प्रचार की कमान संभाल रखी थी और ब्रांड मोदी की सुनामी पूरे देश मे खड़ी कर दी थी। अब प्रशांत किशोर एक बार फिर चर्चा में हैं। चर्चा में होने की वजह कुछ दिनों पहले पीएम से हुई उनकी मुलाकात है।
क्षेत्रीय दलों के मन मे यह डर भी है कि कांग्रेस की स्वीकार्यता अभी भी 2014 जैसी ही है अजर मुमकिन है कि लोगों का समर्थन मोदी विरोध का बावजूद उसे न मिले।
असली पेंच फंसेगा 9 वीं सीट पर। यहां बीजेपी को समर्थन की जरूरत होगी और ऐसे में राज्य सरकार पर हमलावर मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर बड़ा रोल निभाएंगे।
सपा-बसपा के एक होने से मिली हार ने बीजेपी को तगड़ा झटका माना जा रहा है। कांग्रेस गठबंधन में होते हुए भी पूरे परिदृश्य से गायब रही और जमानत तक जब्त करा बैठी।
जिस तरह बहुत ही साफगोई से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने इस हार को स्वीकार किया वह वाकई काबिले तारीफ है। इसके अलावा यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि योगी और शाह दोनो ही नेताओं ने कहा की दो हारे हैं, सारी जीतेंगे।
खबरों के मुताबिक अप्रैल में एलान हो सकते हैं। जी नही ऐसा अब इस माहौल में नही होगा जब कि बीजेपी अपने सहयोगियों और विपक्ष से घिरी हुई है। पहले ऐसा एलान इसलिए संभव था क्योंकि मोदी लहर फीकी पड़ने से पहले मोदी और बीजेपी यह मौका भुना लेना चाहते थे।
बुंदेलखंड के लिए हर बार चुनाव से पहले लंबे चौड़े वादे हर दल द्वारा किये जाते हैं लेकिन इस इलाके की तकदीर बदलने के मकसद से आज तक ऐसा कुछ होता नही दिखा जिससे उम्मीद जगी हो।
योगी को चुनावों से पहले ही मुख्यमंत्री चेहरा बनाने की मांग उठती रही थी। इस मांग को लेकर बीजेपी खुश तो थी लेकिन उनकी हिंदूवादी छवि को लेकर एक डर भी था।प्रचंड बहुमत के बाद यह डर दूर हुआ। उसके बाद योगी सब को पीछे छोड़ते हुए देश के सबसे बड़े सूबे के सीएम बन बैठे।