यूपी में अपने ही बनाए जाल में फंसी बीजेपी

कांग्रेस ने सपा-बसपा पर दबाव बनाने के मकसद से दोनों सीटों पर सपा प्रमुख अखिलेश के मना करने के बावजूद प्रत्याशी खड़े किए। इसके पीछे मकसद यह था कि या तो सपा झुके और एक एक सीट पर बात बने

राहुल के सामने बतौर अध्यक्ष हैं यह बड़ी चुनौतियां, इनसे पार पा गए तो मोदी पर पड़ेंगे भारी

राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस की छवि के साथ अपनी छवि को सुधारना है। कार्यशैली में बदलाव लाना है क्योंकि कांग्रेस आज भी नेहरू इंदिरा वाली कांग्रेस है इसमें कुछ भी नयापन नजर नही आता।

विरोधियों को छोड़िये अब सहयोगी भी नही दे रहे बीजेपी-कांग्रेस को भाव

कांग्रेस को कोई भी क्षेत्रीय दल तवज्जो देता नही दिख रहा और बीजेपी किसी अन्य दल को अपने सामने तवज्जो दे उनका ग्राफ बढ़ाना नही चाहती है। यही वजह है कि हर जायज-नाजायज मांग मानने के बदले बीजेपी ने डिफेंड करना ही सही समझा है।

प्रशांत किशोर की मोदी से मुलाकात, क्या फिर संभालेंगे प्रचार की कमान?

प्रशांत किशोर ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने बीजेपी के प्रचार की कमान संभाल रखी थी और ब्रांड मोदी की सुनामी पूरे देश मे खड़ी कर दी थी। अब प्रशांत किशोर एक बार फिर चर्चा में हैं। चर्चा में होने की वजह कुछ दिनों पहले पीएम से हुई उनकी मुलाकात है।

कभी विपक्ष की धुरी रही कांग्रेस अलग-थलग पड़ रही है, पढ़ें कैसे

क्षेत्रीय दलों के मन मे यह डर भी है कि कांग्रेस की स्वीकार्यता अभी भी 2014 जैसी ही है अजर मुमकिन है कि लोगों का समर्थन मोदी विरोध का बावजूद उसे न मिले।

क्या एक बार फिर यूपी में हारेगी बीजेपी?

असली पेंच फंसेगा 9 वीं सीट पर। यहां बीजेपी को समर्थन की जरूरत होगी और ऐसे में राज्य सरकार पर हमलावर मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर बड़ा रोल निभाएंगे।

मोदी, राहुल की राह मुश्किल करेंगे अखिलेश-माया

सपा-बसपा के एक होने से मिली हार ने बीजेपी को तगड़ा झटका माना जा रहा है। कांग्रेस गठबंधन में होते हुए भी पूरे परिदृश्य से गायब रही और जमानत तक जब्त करा बैठी।

आज शाह-योगी पर उठ रहे सवाल लेकिन आगे वापसी होगी जोरदार, पढ़ें कैसे

जिस तरह बहुत ही साफगोई से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने इस हार को स्वीकार किया वह वाकई काबिले तारीफ है। इसके अलावा यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि योगी और शाह दोनो ही नेताओं ने कहा की दो हारे हैं, सारी जीतेंगे।

30 साल में 7 वीं बार हो रही विपक्षी एकता की बात, इस बार आवाज़ दक्षिण से आई है

इस बार यह मुद्दा उठाया है दक्षिण के तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने और तो और कुछ दलों ने उनके बयान के बाद आश्वासन और स्वीकृति तक दे दी है।

क्या तय समय से पहले हो सकते हैं लोकसभा चुनाव, जानें क्या है सच

खबरों के मुताबिक अप्रैल में एलान हो सकते हैं। जी नही ऐसा अब इस माहौल में नही होगा जब कि बीजेपी अपने सहयोगियों और विपक्ष से घिरी हुई है। पहले ऐसा एलान इसलिए संभव था क्योंकि मोदी लहर फीकी पड़ने से पहले मोदी और बीजेपी यह मौका भुना लेना चाहते थे।

बुंदेलखंड जहां वादों की बरसात में सिर्फ राजनीति की फसल लहलहाती है, किसानों की नही

बुंदेलखंड के लिए हर बार चुनाव से पहले लंबे चौड़े वादे हर दल द्वारा किये जाते हैं लेकिन इस इलाके की तकदीर बदलने के मकसद से आज तक ऐसा कुछ होता नही दिखा जिससे उम्मीद जगी हो।

मोदी के बाद योगी को यूपी लाने की वजह 2019 है

योगी को चुनावों से पहले ही मुख्यमंत्री चेहरा बनाने की मांग उठती रही थी। इस मांग को लेकर बीजेपी खुश तो थी लेकिन उनकी हिंदूवादी छवि को लेकर एक डर भी था।प्रचंड बहुमत के बाद यह डर दूर हुआ। उसके बाद योगी सब को पीछे छोड़ते हुए देश के सबसे बड़े सूबे के सीएम बन बैठे।

नमो-नमो का जाप,विपक्ष पूरा साफ़।

यूपी को युवा लड़कों से ज्यादा नमो के नाम में दिलचस्पी दिखी।साथ की जगह संवाद और वादों पर वोट मिला।बीजेपी को प्रचंड बहुमत इस बात की तस्दीक़ करता है।