यह अभिनेत्री अपनी बॉडी टाइप की वजह से हो गई थी डिप्रेशन का शिकार, आने लगे थे आत्महत्या के ख्याल

हम जिस अभिनेत्री की बात कर रहे हैं वह नाम है इलियाना डीक्रूज का, हाल ही में उन्होंने वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ मेन्टल हेल्थ में अपनी इस मनः स्थित्ति का खुलासा करते हुए कहा था कि वह अपने शरीर के बनावट को लेकर डिप्रेशन में चली गईं थी।

बिहार में कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे से तबाह हैं किसान

बिहार में हर साल बाढ़ और सूखा का प्रभाव बराबर रूप से होता है। मुआवजा का खेल भी चलता है लेकिन किसानों तक जब चेक पहुंचता है तो रकम हास्यास्पद होती है। उत्तरी बिहार में बाढ़ जहां हर साल तबाही की एक नई इबारत लिख फसल को तहस नहस कर जाती है वहीं दक्षिणी बिहार में सूखे से किसान बर्बाद होते हैं।

न खाद, न पानी कैसे चले जिंदगानी

कृषि के लिए पानी की समुचित व्यवस्था आज भी नही है। सरकार ट्यूबवेल लगवाने या पम्प सेट खरीदने के नाम पर सब्सिडी देने की बात करती है, देती भी है लेकिन किसे यह नही पता क्योंकि जिन्हें यह मिलता है वह इसके वाजिब हकदार होते ही नही!

आत्महत्या के बाद कहाँ जाती है आत्मा?

वैदिक ग्रंथों में एक लाइन में इनका जवाब मिलता है। आत्मघाती मनुष्यों के बारे में कहा गया है कि-असूर्या नाम ते लोका अँधेन तमसावृता।तास्ते प्रेत्यभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः

पलायन भी है आत्महत्या की एक बड़ी वजह

शहर आने वाला या अपना राज्य और समाज छोड़ रोजगार ढूंढने वाला हर व्यक्ति महानगर में आकर अपने अरमान पूरे कर ले या उसे तुरंत नौकरी मिल जाये यह कहीं से जरूरी नही

वह अभिनेता जो किसानों, नौजवानों से कहता है आत्महत्या का ख्याल आए तो मुझसे मिलें

कुछ उदाहरण की बात करें तो पुरानी खबरों से गुजरते हुए एक खबर नजर के सामने आई जिसमे नाना के बारे में लिखा गया था कि वह कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों का हौसला बढ़ाने एक पोस्ट से दूसरे पोस्ट तक घूमे थे। वहीं किसान आत्महत्या पर काम करते हुए उन्होंने निजी रूप से सैकड़ों किसानों के लोन भरे या मदद मांग कर उनकी मदद की

आत्महत्या का आये ख्याल तो अपने आप से पूछें यह सवाल

सवाल यह है कि क्या जो जिंदगी भगवान ने हमे दी है उसे हम अपनी मर्जी से खत्म कर कुदरत के नियमों के विपरीत नही जा रहे? क्या हमें समस्याओं से लड़ना नही सीखना चाहिए? क्या मौत को मात देने के बदले यह ज्यादा आसान है?

आत्महत्या के बढ़ते आंकड़ों के खिलाफ जब तेलंगाना में किसानों ने फूंक दी अपनी फसल

यूँ तो यह विरोध सिर्फ मिर्च की सही कीमत न मिलने को लेकर था लेकिन यह आंदोलन सभी किसानों के लिए एक प्रेरणा बन गया।

किसानों की लाश पर राजनीति कब तक

कर्ज़ माफी, सब्सिडी, खाद पानी हर तरह से यहां तक कि फसल नुकसान से लेकर हर वह कड़ी इस वादे का हिस्सा होती है जिससे किसान मोहित हो सके लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात पर आकर खत्म हो जाता है।

क्या एमपी में बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा किसान आत्महत्या?

सवाल है कि क्या राज्य में किसान आत्महत्या का मुद्दा चुनावी मुद्दा बनेगा या बस जात-धर्म और व्यक्तिगत बातों की बुनियाद पर चुनाव लड़ा जाएगा।

गुजरात मे यह कैसा विकास, किसानों की कब्रगाह बनता सौराष्ट्र

गुजरात के शहर अहमदाबाद से करीब 400 किलोमीटर दूर सौराष्ट्र के इलाके में विकास की नही तंगहाली की कहानियां गूंजती हैं। किसानों की आत्महत्या की खबर यहां आम बात है।