राजनीति का ऊंट कब किस करवट बैठे कहना या अनुमान लगाना थोड़ा मुश्किल होता है। यहां न किसी का कोई परमानेंट दुश्मन है और न दोस्त। न किसी वादे का न किसी इरादे की यहां कोई जगह है। अब आप सोच रहे होंगे कि हम ऐसी बातें क्यों लिख रहे?