कविता

वह पगली आज फिर रुला गई…

वह पगली आज फिर रुला गई,भरोसे की सीमा रेखा शक की बिनाह पर लांघ गई,सबूत, बात सब भूल गई,प्यार, जज्बात, सोच समझ सब तज गई,एक पल में पराया बना गई, आज वह फिर रुला गई-2 उसके लिए हम न जानें कितने बदल गए,न जाने कितने सुधर गए,हमारे चर्चे कभी अखबारों में थे,आज हम कुछ लोगों […]

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