बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में कई चीजें यूँ तो पुरानी कहानी सी दिखती हैं लेकिन इस बार क्या पिछले 15 सालों की तरह फिर सीएम नीतीश कुमार बनेंगे और जीत की वही पुरानी इबारत लिखेंगे या नतीजे बदलेंगे?

कोरोना काल मे आयोजित हो रहे बिहार विधानसभा चुनाव में यूँ तो अभी तक यह अनुमान लगाना थोड़ा मुश्किल है लेकिन सत्ता के खिलाफ लहर न सही लेकिन एक हवा तो बनी है इतना पक्का है। 


इसके अलावा हाल के दिनों में जिस तरह महागठबंधन की तरफ से तेजस्वी ने मुद्दों का चुनाव किया है वह इन चुनावों में अहम साबित होने जा रहा है। पिछले कुछ महीनों से तेजस्वी सरकार पर बाढ़ और कोरोना को लेकर हमलावर थे।

हालांकि बदले माहौल में तेजस्वी ने बेरोजगारी का मुद्दा उठाया और अब इसे अपने संकल्प पत्र में जगह देते हुए हर रैली और प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसे दोहरा रहे हैं। ऐसे में नौकरी मांगते वक़्त लाठी खाने की बात, परीक्षा से पहले पेपर लीक की बात शायद युवाओं को याद आ ही जाएगी और इसका नुकसान एनडीए गठबंधन को होगा।


भीड़ की बात करें तो कल बाँका जिले में तेजस्वी की पांच सभाओं में उमड़ी भीड़ यह बताने को काफी है कि वह रैली में लोगों की भीड़ लाने की कला अपने से छोटे से राजनीतिक करियर में सीख गए हैं।

दूसरे तरफ़ अगर एनडीए की रैलियों की बात करें तो ज्यादातर बड़े बीजेपी नेताओं के मैदान में आने के बाद भी भीड़ नदारद ही नजर आ रही है। हालांकि इसी भीड़ की कहानी को समझें तो 2015 में भी भीड़ तब राजद-जदयू वाले महागठबंधन के हिस्से ही थी।


इस भीड़ को वोट में बदलते भी हमने देखा था। तब लालू मोर्चे पर डंटे थे। रैलियों में उमड़ी भीड़ वोटों में तब्दील हुई थी। उस समय राजद सीटों के मामले में जदयू से आगे भी रही थी। इस बार लोजपा की एंट्री से जहां राजद की बिन मांगी मुराद पूरी होती नजर आ रही वहीं तेजस्वी के उठाये मुद्दे और रैलियों में उमड़ती भीड़ भी कुछ अलग संकेत दे रही है।

चिंता बीजेपी खेमे में फिलहाल नही है क्योंकि अभी बीजेपी के सबसे बड़े प्रचारक नरेंद्र मोदी का मैदान में उतारना बाकी है और भीड़ को मंच तक लाने में मोदी का कोई सानी नही है। ऐसे में देखना है कि रैलियों में उमड़ी भीड़ नतीजों में कितना प्रभाव दिखाती है।