देश मे इन दिनों कोर्ट से ज्यादा मीडिया यह साबित करने में लगा हुआ है कि कौन दोषी है और कौन नही है। मीडिया ट्रायल का यह एक ऐसा दौर है जिसमे इल्जाम, अपराध, गवाह, सबूत, सजा सब मीडिया का एक तबका तय कर बैठ जाता है बेशक कोर्ट ने उस व्यक्ति को अपराधी न माना हो। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि अगर ऐसा नही है तो बार बार कपिल मिश्रा पर यह इल्जाम घूम फिर कर कहाँ से पहुंच जाता है कि दिल्ली में हुए दंगे या उनके तथाकथित भड़काऊ भाषण कोई संबंध था? पुलिस या कोर्ट ने कपिल मिश्रा को क्लीन चीट दी लेकिन मीडिया यह साबित करने में कभी पीछे नही रहा कि कपिल दोषी हैं।

ऐसी ही एक ख़बर में बीबीसी ने बताया है कि दिल्ली दंगों के ऊपर लिखी किताब ‘डेल्ही रायट्स 2020-द अनटोल्ड स्टोरी” को छापने से एक प्रकाशक ने इसलिए मना कर दिया क्योंकि कपिल मिश्रा इस बुक लांच के कार्यक्रम में ऑनलाइन मौजूद थे। अगर ऐसा है तो प्रकाशक ने यह क्यों नही बताया कि आखिर किस कोर्ट ने कपिल मिश्रा को दोषी माना है और उसके लिए उन्हें क्या सजा सुनाई गई है। हां भाषा को लेकर कई लोगों पर कोर्ट ने सवाल उठाए थे और अब जांच में जो दोषी पाए गए उनपर यथाउचित कार्रवाई जारी है।

गौरतलब है कि किताब को भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव, सांसद और वरिष्ठ नेता भूपेन्द्र यादव ने लाँच किया। किताब को मोनिका अरोड़ा, सोनाली चितालकर और प्रेरणा मलहोत्रा ने लिखा है।अभी से कुछ देर पहले कपिल मिश्रा ने एक ट्वीट के माध्यम देते हुए बताया कि अब इस किताब को गरुड़ पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित किया जायेगा। उन्होंने यह भी बताया कि इस किताब की एडवांस बुकिंग भी शुरू हो चुकी है। इससे पहले इस पूरे घटनाक्रम पर एक ट्वीट के माध्यम से जवाब देते हुए कपिल मिश्रा ने लिखा था कि न ये सड़क बंद कर पाए थे न यह किताब बंद कर पाएंगे।

दिल्ली दंगों की बात करें तो दिल्ली सरकार से यह सवाल क्यों नही पूछा जा रहा कि राजद्रोह के केस मामले में ताहिर हुसैन की फ़ाइल क्यों अटकी हुई है? दंगों में जिनकी भूमिका थी उनका इस तरह बहिष्कार न कर उन्हें पीड़ित दिखाने के पीछे क्या वजह है? शाहीनबाग कनेक्शन से लेकर धर्म का कनेक्शन सामने आ गया लेकिन सवाल या बहिष्कार कपिल मिश्रा का क्यों? क्यों नही इस डिबेट में खुल कर आप कह पाते कि हां किसी धर्म विशेष के प्रति नफरत की वजह से कुछ लोगों ने इसे अंजाम दिया।

अब बात उस विवाद की जिसमें कपिल मिश्रा की वजह से किताब छापने से न सिर्फ इनकार किया गया बल्कि पब्लिशर ने अपनी सफाई में कपिल मिश्रा का नाम लिए बग़ैर कहा, “हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्के हिमायती हैं लेकिन समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को लेकर भी उतने ही सचेत हैं। दिल्ली दंगों के बारे में इस साल सितंबर में वह ‘डेल्ही रायट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी’ प्रकाशित करने वाला था लेकिन लेखकों ने ऐसे लोगों को प्री-लॉन्च इवेंट आमंत्रित किया जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता।”इस बयान के बाद यह समझना बहुत मुश्किल नही की इशारा कहाँ था?

इस पूरे विवाद के बीच किताब की एक लेखिका मोनिका अरोड़ा ने कहा, ‘यदि एक प्रकाशक मना करता है, तो 10 और आ जाएंगे। बोलने की आजादी के मसीहा इस किताब से डरे हुए हैं।’ खैर इस विवाद के बाद इतना तय है कि बिना प्रमोशन के यह किताब अब लोगों के जुबान पर है और सब को बेसब्री से इसके बाजार में आने का इंतजार है।