बिहारियों के बारे में एक बात पूरी दुनिया मे डंके की चोट पर कही जाती है। वह बात है कि वह मेहनत और लगन से अपनी पहचान रखते हैं। जिस तरह दुनिया के कोने-कोने में हिंदुस्तान के नागरिक रहते हैं ठीक उसी तरह पूरे हिंदुस्तान में बिहार और यूपी के लोग आपको कहीं भी मिल जाएंगे। उनके पास मेहनत के अलावा और कोई संपदा नही है। न राज्य सरकारों ने आज तक ऐसा कुछ किया कि बिहारी बिहार से पलायन न कर अपने राज्य में मेहनत-मजदूरी करें। पिछले 10 साल की ही बात करें जबकि बिहार में सुशासन की सरकार है,वैसे वक़्त में करीब 7 लाख लोग पलायन कर गुजरात गए। अब बात करते हैं बिहार और यूपी के लोगों पर हुए हमलों की।

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गुजरात के साबरकांठा में एक नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के बाद इसका आरोप एक गैर गुजराती पर लगा। इसी के बाद यूपी-बिहार के लोगों को निशाना बनाया जाने लगा। देखते देखते कुछ असामाजिक लोगों की यह कारस्तानी हिंसा का रूप ले गई। आग छह जिलों में पहुंची। प्रशासन जब तक जागता तब तक काफी देर हो चुकी थी। घर तोड़े गए,लोगों को पीटा गया। गुजरात छोड़ने पर बाध्य किया गया। अब तक 50 हज़ार लोग गुजरात छोड़ चुके हैं। अभी हज़ारों वहां से निकलने की जुगत में हैं। डीजीपी का बयान आया कि त्यौहार की वजह से पलायन हो रहा है। हालांकि यहां यह गौर करने की बात है बिहारी सिर्फ छठ पूजा में इतनी संख्या में वापस आते हैं। ऐसे में छठ को लगभग एक महीने से ज्यादा का वक़्त है।

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अब बात करते हैं गुजरात मे इसका क्या असर होगा। बिहार-यूपी के मजदूरों का बड़ा वर्ग वहां की कंपनियों में काम करता है। गोलगप्पे से लेकर पेंटर और प्लम्बर तक कि गुजरात की जरूरतें बिहारी मजदूरों के भरोसे है। ऐसे में गुजरात की अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव होगा यह तय है। सूरत जिसे हीरों के लिए जाना जाता है वहां तो गुजरातियों से ज्यादा बिहारी लोग हैं। सूरत में 56 फीसदी आबादी बिहारियों की है। वडोदरा,अहमदाबाद इत्यादि जिलों में भी कम या ज्यादा यही हाल है। ऐसे में यह तय है कि इसका व्यापक प्रभाव होगा और गुजरात की अर्थव्यवस्था को उबरने में लंबा वक्त लगेगा। साथ ही बिहार-यूपी के लोगों के लिए बेशक यह दुखद है लेकिन इतना तय है इससे उबरने के बाद भी वह जल्दी तो गुजरात नही लौटेंगे।इतना डर व्याप्त है।

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विकल्प उनके लिए खुले भी हैं। ऐसे में गुजरात कैसे उबरेगा? खैर पीएम गुजराती हैं और पूर्वांचल से सांसद हैं जहां के लोग आज उनके राज्य में पीटे और खदेड़े जा रहे हैं। ऐसे में उन्हें तत्काल इसपर संवाद करने की जरूरत है। इसके अलावा अल्पेश ठाकोर जिनपर इस हिंसा को भड़काने का आरोप है और जो बिहार कांग्रेस के सह प्रभारी हैं उनपर कार्रवाई होनी चाहिए। हालांकि नीतीश-रुपाणी के बातचीत के बाद कार्रवाई तेज हुई है लेकिन डर निकालना बड़ी चुनौती अब भी है।

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