नरेंद्र गिरी की वसीयत में फंसा पेंच, कई बड़े खुलासे होने की उम्मीद

अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष मंहत नरेंद्र गिरी के मृत्यु के केस की गुत्थी अभी भी अनसुलझी है। केस मिलने के बाद से सीबीआई लगातार प्रयास में जुटी है। सुसाइड नोट के आधार पर तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया था जिसपर आरोपियों का कहना है कि सही दिशा में जांच होनी चाहिए, क्योंकि उनके ऊपर लगे आरोप झूठे हैं।

अब हाल ही में महंत के वसीयत का जिक्र सामने आया है जिससे सुसाइड नोट के आधार पर चल रही जांच दूसरी ओर मुड़ गयी है। सीबीआई के हाथ लगे नए सुराग के अनुसार मंहत ने तीन वसीयत बनवाई थी।

माना जा रहा है कि इन वसीयतों से कई सुराग खुल सकते हैं और जांच में मुख्य आरोपी सामने आ सकता है। ज्ञात हो कि, 10 साल में मंहत ने 3 वसीयतनामा बनवाए जिनमें अलग-अलग उत्तराधिकारियो के नाम जुड़े है। उत्तराधिकारी बनने वाले मंहत के शिष्य हैं। रिपोर्ट के अनुसार मंहत ने पहली वसीयत 7 जनवरी 2010 में लिखी जिसमें उत्तराधिकारी संत बलबीर गिरी बने थे।

दूसरी वसीयत उसके अगले साल यानि 29 अगस्त 2011 में आई जिसमें उत्तराधिकारी के तौर पर आनंद गिरी को चुना गया। जबकि तीसरी वसीयत 2 जून 2020 में लिखी गई जिसमें उत्तराधिकारी पुन: बलबीर गिरी को बनाया गया।

इस बात का खुलासा महंत के वकील ऋषि शंकर द्विवेदी ने किया। यानी महंत नरेंद्र गिरि ने 7 जनवरी 2010 को लिखी अपनी पहली वसीयत में शिष्य बलवीर गिरि को अपना उत्तराधिकारी चुना था लेकिन उनके हिमालय में तपस्या के लिए जाने के बाद उनकी जगह पर आनंद गिरि को उत्तराधिकारी घोषित किया गया जिसके लिए महंत ने 29 अगस्त 2011 को दूसरी वसीयत लिखी थी।

महंत नरेंद्र गिरि के पास से जो सुसाइड नोट मिला था, उसमें भी उन्होंने बलवीर गिरि को अपना उत्तराधिकारी बताया था जो तीसरे वसीयत के हिसाब से था। हालांकि सुसाइड नोट महंत द्वारा ना लिखे होने की बात कहकर उसपर सवाल उठाया गया।

2 जून 2020 को लिखी गई महंत नरेंद्र गिरि की अंतिम वसीयत में यह भी बताया गया है कि क्यों आनंद गिरि को हटाकर बलवीर गिरि को फिर से बाघम्बरी मठ का उत्तराधिकारी बनाया गया। इसके साथ ही महंत ने यह घोषित किया था कि उत्तराधिकारी मठ के सभी कार्यों के प्रति उत्तरदायी और समस्त चल व अचल संपत्ति का मालिक होगा।

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