सोशल मीडिया पर सवाल, क्या धर्म और गाय देखकर याद आती है मॉब लिंचिंग?

भारत और भारत के राजनीति में इन दिनों एक शब्द काफी चर्चा में है। यह शब्द है मॉब लिंचिंग यानि भीड़ द्वारा किसी खास मुद्दे या आरोप को लेकर किसी खास धर्म या जाति के व्यक्ति की हत्या। यह हत्याएं दो वजहों से चर्चा में हैं। घटनाएं एक जैसी हैं लेकिन वजह अलग-अलग थी। इनमे पहली वजह गाय थी और हत्यारे तथाकथित गौ रक्षक थे। दूसरी जो घटना हुई उसमे पीड़ित आम और खास लोग थे और आरोपी वह भीड़ थी जो सोशल मीडिया के फेक मैसेज की भुक्तभोगी थी। जी हां, हम बिल्कुल सही कह रहे हैं। पहली अफवाह में जहां गाय को बूचड़खाने ले जाने के आरोप में एक खास धर्म के लोगों को शिकार बनाया गया वहीं दूसरे में सोशल मीडिया पर वायरल बच्चा चोर गिरोह के एक मैसेज ने भीड़ को हत्या जैसे जघन्य अपराध के लिए उकसाया और नतीजा यह हुआ कि दो दर्जन से ज्यादा लोग इस फेक मैसेज की बलि चढ़ गए।


मॉब लिंचिंग की इस घटना ने न सिर्फ आम लोगों बल्कि केंद्र की मोदी सरकार और देश की सबसे बड़ी अदालत को भी परेशान कर दिया। मीडिया ने सवाल उठाने शुरू कर दिए और राजनीति के आका इस पर राजनीतिक रोटियां शेंकने लग गए। इन सब के बीच एक बात खास थी कि इस मुद्दे को लेकर हर वर्ग,हर जाति, हर धर्म और हर राजनीतिक दल ने चिंता जाहिर की। यह तब और सुर्खियों में आ गया जब हाल ही में अलवर में मॉब लिंचिंग की घटना में रकबर नाम के शख्स को पीट पीट कर मार दिया गया। हालांकि इस मुद्दे पर समाज और राजनीतिक दल दो गुटों में बंटे हुए हैं इसमे कोई दो राय नही। इज़के अलावा मीडिया में भी मतभेद हैं इसमे भी कोई संकोच नही है। इसके कई सबूत भी हैं। सबूत के रूप में पेपर कटिंग और पुराने केस के हवाले दिए जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी दो धड़े देखने और पढ़ने को मिल रहे हैं।


इन सभी बातों और खबरों के बीच चिंता की बात यह है कि क्या गाय और फेक मैसेज देखकर ही मॉब लिंचिंग की घटनाओं की गंभीरता दिखाई देती है? क्या किसी खास धर्म या जाति का राजनीति और मीडिया के लिए इतना महत्व है कि इसे बड़ी खबर और वजह बनाया जाता है? यह सवाल अटपटे लग सकते हैं लेकिन इतना तो तय है कि यह एक कड़वी सच्चाई है। अगर यह सच्चाई नही है तो हाल ही में हुई दिल्ली में अंकित सक्सेना, होली के समय डॉक्टर नारंग, कासगंज में चंदन और केरल में एक किलो चावल चोरी के आरोप में गरीब मधु की हत्या और काफी पहले हुई कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या व विस्थापन, 84 सिख दंगे में हुआ कत्लेआम और गोधरा में ट्रेन की बोगी को जलाकर 75 से अधिक लोगों को मारने जैसी घटनाएं मॉब लिंचिंग के दायरे में क्यों नही आईं? जवाब सोचिएगा? कमेंट में हमें बताइएगा? क्योंकि हत्या धर्म या जाति या भले ही अलग-अलग वजहों से हुई हो लेकिन मरता हमेशा इंसान और इंसानियत है। कृपया अफवाहों से बचें और भीड़ का हिस्सा बनने से बचें।

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