आप किसी केमिस्ट की दुकान पर जाइये और उसे किसी भी सिरप या नींद की दवा का नाम बताइए हो सकता है वह पहले इनकार करे या ना नुकुर करे लेकिन जैसे ही आप उन्हें थोड़ा रिक्वेस्ट करेंगे या ज्यादा पैसे का आफर देंगे तो वह एक पल सोचे बिना आपको वह दवाइयां दे देगा।
सवाल यह है कि क्या जो जिंदगी भगवान ने हमे दी है उसे हम अपनी मर्जी से खत्म कर कुदरत के नियमों के विपरीत नही जा रहे? क्या हमें समस्याओं से लड़ना नही सीखना चाहिए? क्या मौत को मात देने के बदले यह ज्यादा आसान है?
भले ही फ़िल्म शुरू होने से पहले यह लिखा जाता हैं कि इस फ़िल्म के सारे पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं इसके बावजूद लोग इसे सच मानते हैं या यकीन कर लेते हैं।
किसान आत्महत्या जैसे गंभीर मसले पर एक नाटक का मंचन किया गया और इस मंचन के दौरान अपने गले ने फंदा डाल जो इंसान भाग ले रहा था वह सच मे झूल गया और अभिनय करते हुए मर गया।
इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि कुल जनसंख्या की लगभग 13.7 फीसदी मानसिक समस्या से ग्रसित है जिनमे से 10.6 फीसदी लोगों को तत्काल दो डॉक्टरी देखभाल की जरूरत होती है।
डॉ बेनी सिंह पर काफी कर्ज था और इसी की वजह से उन्होंने सपरिवार आत्महत्या करने की सोची। जहर उन्होंने भी इस्तेमाल किया लेकिन इसका असर उनपर नही हुआ और मामला खुल गया।
जब उनके माता पिता का निधन हुआ तब वह बिल्कुल अकेली पड़ गईं, जीवन की राह कठिन लगने लगी और अकेलापन हावी होने लगा ऐसे में वह डिप्रेशन में चली गईं और आत्महत्या के ख्याल आने लग गए।
इसका खुलासा उन्होंने खुद अपनी आत्मकथा स्पीड डेमंस में किया है। वह लिखते हैं कि यह बात 2004 की है जब इंग्लैंड की टीम दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर थी और लंबे समय तक विदेशी दौरे पर रहने की वजह से वह काफी में तनाव में थे। इसी दौरान उनके मन मे आत्महत्या की बात आने लगी थी।