बीजेपी और कांग्रेस दोनो के लिए यह चुनाव नाक का सवाल थे। 2019 से पहले इसे सत्ता का सेमीफाइनल माना जा रहा था। इन चुनावों में सत्ता विरोधी लहर के हावी होने की संभावना प्रबल थी। यह नजर भी अब आ रही है।
प्रशांत किशोर ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने बीजेपी के प्रचार की कमान संभाल रखी थी और ब्रांड मोदी की सुनामी पूरे देश मे खड़ी कर दी थी। अब प्रशांत किशोर एक बार फिर चर्चा में हैं। चर्चा में होने की वजह कुछ दिनों पहले पीएम से हुई उनकी मुलाकात है।
राहुल गांधी ने बतौर अध्यक्ष कांग्रेस के अधिवेशन के समापन सत्र को संबोधित किया इस दौरान वह लगातार मोदी सरकार और बीजेपी के साथ आरएसएस पर हमलावर रहे और जमकर शब्दबाण चलाये।
मोदी सरकार आज कई मोर्चों पर घिरी है। विपक्ष हमलावर है, नौजवान और किसान सड़क पर उतर प्रदर्शन करने में लगे हैं, सीमा पार से आतंकवाद और सीमा के अंदर नक्सलवाद के मुद्दे भी सरकार के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं।
पीएम मोदी की तो फेसबुक पर पीएम मोदी को फॉलो करने वाले और उनके पेज को लाइक करने वालों की संख्या चार करोड़ बत्तीस लांख से ज्यादा है। वहीं दूसरी तरफ देखें तो राहुल गांधी को लगभग 16 लाख साठ हजार से कुछ ज्यादा लोग फॉलो करते हैं।
2015 में ट्विटर जॉइन करने वाले राहुल गांधी ने अपना ट्विटर एड्रेस यानि ट्विटर हैंडल का नाम बदल लिया है। साथ ही अब वह पहले के मुकाबले अधिक सक्रिय भी नजर आ रहे हैं।
किसानों और युवाओं की उपेक्षा पर बोलते हुए राहुल ने कहा कि आज के समय मे नौजवान और किसान दोनों ही परेशान हैं और यही 2019 में बदलाव लाने की क्षमता भी रखते हैं।
उन्होंने अपने भाषण में कहा कि मैंने अपनी जिंदगी के 23 साल कांग्रेस में रहते हुए व्यर्थ गंवा दिए। आज जब मैं उस दौर को याद करता हूँ तो मुझे अफसोस होता है।
तीसरे मोर्चे की कवायद में कांग्रेस पूरी तरह तटस्थ है, उसका जनाधार भी खिसकता नजर आया है ऐसे में बीजेपी भी यह मान कर चल रही है कि कांग्रेस से ज्यादा खतरा के क्षेत्रीय गठबंधन और तीसरे मोर्चे से है।
डिजिटल इंडिया की बात करने वाली सरकार ऐसे यज्ञ के आयोजन की अगुवा बनेगी तो सवाल उठने लाजमी भी हैं. क्या सरकार ऐसे जवाब देगी? कैसे कड़ी कारवाई होगी? क्या सरकार के पास अब कोई मुद्दा और कारवाई का दमखम नहीं है?