आज भले ही वह एक चुनौती से भरी हुई राह पर कांग्रेस को लेकर चल रहे हैं लेकिन ऐसा नही है कि नाकामी ही उनकी पहचान है जिस मेहनत से राहुल राजनीति में डंटे हैं उससे साफ है कांग्रेस और राहुल के खाते में भी आने वाले समय मे कई बड़ी उपलब्धियां दर्ज होंगी।
राजनीति के महारथी अभी से अपने अपने दायरे बनाने में और दूसरों के लिए चक्रव्यूह की रचना करने में लगे हैं। हर तरफ से अपने मुताबिक एक परिधि बनाई जा रही है ताकि खुद को सुरक्षित रख कर दूसरों का मुकाबला किया जा सके। यह परिधि कुछ और नही मुद्दे हैं।
कांग्रेस को कोई भी क्षेत्रीय दल तवज्जो देता नही दिख रहा और बीजेपी किसी अन्य दल को अपने सामने तवज्जो दे उनका ग्राफ बढ़ाना नही चाहती है। यही वजह है कि हर जायज-नाजायज मांग मानने के बदले बीजेपी ने डिफेंड करना ही सही समझा है।
प्रशांत किशोर ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने बीजेपी के प्रचार की कमान संभाल रखी थी और ब्रांड मोदी की सुनामी पूरे देश मे खड़ी कर दी थी। अब प्रशांत किशोर एक बार फिर चर्चा में हैं। चर्चा में होने की वजह कुछ दिनों पहले पीएम से हुई उनकी मुलाकात है।
राहुल गांधी ने बतौर अध्यक्ष कांग्रेस के अधिवेशन के समापन सत्र को संबोधित किया इस दौरान वह लगातार मोदी सरकार और बीजेपी के साथ आरएसएस पर हमलावर रहे और जमकर शब्दबाण चलाये।
मोदी सरकार आज कई मोर्चों पर घिरी है। विपक्ष हमलावर है, नौजवान और किसान सड़क पर उतर प्रदर्शन करने में लगे हैं, सीमा पार से आतंकवाद और सीमा के अंदर नक्सलवाद के मुद्दे भी सरकार के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं।
अगर राहुल मोदी के विकल्प के रूप में खुद को प्रोजेक्ट कर पाने में सफल हुए तो 2019 में न सिर्फ बीजेपी के लिए जीत की राह बड़ी मुश्किल होगी बल्कि यह राहुल की काबिलियत और क्षमता बताने के साथ कांग्रेस की वापसी की राह आसान भी करेगी।
क्षेत्रीय दलों के मन मे यह डर भी है कि कांग्रेस की स्वीकार्यता अभी भी 2014 जैसी ही है अजर मुमकिन है कि लोगों का समर्थन मोदी विरोध का बावजूद उसे न मिले।
कांग्रेस के प्लेनरी सेशन में पार्टी अधिकारियों और शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में एक ऐसे प्रस्ताव पर मुहर लग गई जिसमें राहुल गांधी को यह अधिकार होगा कि वह अपनी नई टीम खुद चुनें।