परिवारवाद का आरोप लगता आया है। घोटाले के आरोप लगे। आपातकाल कांग्रेस के ही शासनकाल में लगा, सिख विरोधी दंगे हुए। इंदिरा और राजीव ने अपनी जान गंवाई। इसके बावजूद आज अगर यह पार्टी खड़ी है और सिमटती नजर आने के बावजूद बीजेपी को टक्कर देने का दम्भ भरती नजर आ रही है तो यकीन मानिए कुछ तो खास इसमे जरूर है।
बीजेपी और कांग्रेस दोनो के लिए यह चुनाव नाक का सवाल थे। 2019 से पहले इसे सत्ता का सेमीफाइनल माना जा रहा था। इन चुनावों में सत्ता विरोधी लहर के हावी होने की संभावना प्रबल थी। यह नजर भी अब आ रही है।
केरल बीजेपी के इकाई प्रमुख रह चुके कुम्मनम राजशेखरन को मिजोरम का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है। वह शपथ लेकर अपना कार्यभार भी संभाल चुके हैं लेकिन उनकी नियुक्ति का विरोध कई स्थानीय राजनीतिक और अन्य संगठन कर रहे हैं।
यह वह परंपरा है जहां सत्ता के लिए समाज के टुकड़े करने की एक साजिश की बू आ रही है। बीजेपी वहां शून्य से शिखर पर आने को आतुर है वहीं वाम के लाल किले को बंगाल में ध्वस्त कर सत्ता में काबिज हुईं ममता को अपने ऊपर कुछ ज्यादा ही यकीन हो चला है।
कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर का गठबंधन अगर आने वाले भविष्य में जमीनी हकीकत बना तो शाह को सोचने की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो खुद बीजेपी के आंतरिक सर्वे में बीजेपी बहुमत से दूर दिख रही है।
क्षेत्रीय दलों के मन मे यह डर भी है कि कांग्रेस की स्वीकार्यता अभी भी 2014 जैसी ही है अजर मुमकिन है कि लोगों का समर्थन मोदी विरोध का बावजूद उसे न मिले।
उन्होंने अपने भाषण में कहा कि मैंने अपनी जिंदगी के 23 साल कांग्रेस में रहते हुए व्यर्थ गंवा दिए। आज जब मैं उस दौर को याद करता हूँ तो मुझे अफसोस होता है।