बिहार विधानसभा चुनावों को लेकर अगर अभी तक प्रचार और नेताओं के बयान पर नजर डालें तो बेरोजगारी को बड़ा मुद्दा माना जा रहा है। कोरोना, बाढ़, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर बहुत बातें होती नही दिख रही है। हां सत्ताधारी एनडीए के तरफ से कोरोना काल मे प्रवासी मजदूरों को लाने और उनके रहने खाने की व्यवस्था और क्वारंटाइन सेंटरों की व्यवस्था के बारे में जरूर बताया जा रहा है।
अब बात करें असली मुद्दों की तो बिहार में उद्योग और रोजगार दो बड़े मुद्दे हैं। उद्योग जहां चौपट हैं वहीं रोजगार के नाम पर सरकार के पास गिनाने को बहुत बड़ी उपलब्धि कुछ नही है। इससे भी ज्यादा इस बार युवाओं के सवाल उम्मीदवारों पर भारी पड़ रहे हैं।
विरोध का एक ट्रेंड शुरू होता दिख रहा और अब यह साफ है कि राजनीति वादों पर नही विकास के नाम और काम से चलेगी?
पिछले कुछ दिनों में लगातार यह देखने को मिला कि सिटींग एमएलए, एमपी और मंत्रियों से लोग खास कर युवा खूब सवाल कर रहे। इस सवालों में यूँ तो बात स्थानीय मुद्दों की है और यह मुद्दे काफी छोटे लेकिन अहम हैं।
नाली और सड़क जैसी मूलभूत जरूरतें भी लोगों को नही मिली। स्वास्थ्य और शिक्षा की बदहाली के किस्से बिहार के अस्पतालों और स्कूलों में पहले से ही आम हैं।
ऐसे में युवा अब रोजगार के साथ इन मुद्दों को लेकर भी उम्मीदवारों से सवाल कर रहे। लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत नजर आता है। हालांकि चुनावी मौसम में नौकरी देने के वादे और भाषणों के होड़ की बात करें तो युवाओं को किसी दल या नेता से कोई खास उम्मीद नजर नही आती है।
इसके पीछे की वजह नेताओं का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड है। ऐसे में देखना दिलस्चस्प होगा कि बेरोजगार और नौकरी के लिए जद्दोजहद करता युवा स्थानीय मुद्दों पर वोट करता है या बेरोजगारी जैसे मुद्दों को अहम मानता है।
