एक तरफ हम विकास की अंधी दौड़ में शामिल होकर अपनी संस्कृति और संस्कार भूलते जा रहे हैं वही छोटी-छोटी परेशानियों से तंग आकर आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं।