दादरी की दौड़ लगाने वाले केजरीवाल दिल्ली में हिंदू हत्याओं पर खामोश क्यों?

अखलाक की मौत पर दादरी जाने वाले और ताहिर हुसैन जैसे दंगाइयों का साथ देने वाले केजरीवाल के मुंह से इन हत्याओं पर मुआवजा तो दूर सांत्वना के एक शब्द न निकले।

दिल्ली की राजनीति इन दिनों उफान पर है। एमसीडी चुनाव के नामांकन का आज आखिरी दिन है हालांकि टीवी चैनलों और डिजिटल मीडिया में यह मुद्दा गायब है। आज सुबह आई एक खबर ने न सिर्फ दिल्ली को बल्कि पूरे देश को दहला कर रख दिया। मुंबई के कॉल सेंटर से शुरू हुई प्रेम कहानी का अंजाम दिल्ली पहुंचते ही ऐसे क्रूर हत्याकांड में बदल गया कि जिसने भी सुना वह हिल गया।

दरअसल हम बात कर रहे हैं दिल्ली के महरौली में हुए हत्याकांड की। इस हत्याकांड का खुलासा तब हुआ जब मुंबई से श्रद्धा का परिवार दिल्ली पहुंचा और पुलिस को बेटी के लापता और संपर्क में न होने की बात बताई। परिवार ने हत्या का शक आफताब नाम के युवक पर जताया। जांच के बाद यह स्पष्ट हो गया कि जिसके लिए श्रद्धा परिवार को छोड़ दिल्ली आई उसने ही न सिर्फ हत्या कि बल्कि टुकड़ों में काट कर शव को जंगल में ठिकाने लगाया। यह न सिर्फ हत्या बल्कि लव जिहाद से जुड़ा मामला भी प्रतीत होता है। लोग लगातार इस एंगल से भी मामले की जांच की मांग कर रहे हैं।

हालांकि दिल्ली में यह ऐसा पहला मामला नहीं है। दिल्ली में पिछले कुछ सालों में ऐसी न जाने कितनी हत्याएं हुई जिसमे हिंदुओं को निशाना बनाया गया लेकिन इन सब में एक बात आम रही की इन हत्याओं से न दिल्ली सरकार को फर्क पड़ा न ही केजरीवाल को जो कभी अखलाक की हत्या पर दादरी तक दौड़े गए थे। केजरीवाल ने कभी इन हत्याओं पर एक शब्द बोलना भी उचित न समझा।

कुछ ऐसी हत्याओं की बात करें तो यह लिस्ट काफी लंबी है जैसे डॉ. नारंग, अंकित सक्सेना, रिंकू शर्मा, ध्रुव त्यागी, बादल राजपूत, हीरा सिंह और न जाने ऐसी कितनी हत्याएं हुई। लेकिन अखलाक की मौत पर दादरी जाने वाले और ताहिर हुसैन जैसे दंगाइयों का साथ देने वाले केजरीवाल के मुंह से इन हत्याओं पर मुआवजा तो दूर सांत्वना के एक शब्द न निकले। ऐसे में क्या यह मानें कि केजरीवाल की खामोशी भी किसी खास समुदाय को खुश करने का जरिया है?

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