एनटीए यानि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी और बीएचयू यह दोनो नाम इन दिनों चर्चा के केंद्र में हैं। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक छात्र इनके खिलाफ मुखर हैं। इसके पीछे की वजह भी बहुत बड़ी है और छात्रों के भविष्य से जुड़ी है।

दरअसल इस विरोध के पीछे कारण है बीएचयू एंट्रेंस के दौरान हुई बदइंतजामी, अव्यवस्था और मनमाना रवैया। छात्रों का आरोप है कि एनटीए ने सिलेबस से बाहर के सवाल पूछे। खैर यह तो एक कारण है इसके अलावा और भी कई वजहें हैं जिस वजह से एनटीए का विरोध हो रहा है।


छात्रों का कहना है कि एडमिट कार्ड जारी करने में भी भारी लापरवाही बरती गई। नियम के मुताबिक किसी भी परीक्षा से कम से कम 24 घंटे पहले एडमिट कार्ड जारी होने चाहिए लेकिन एनटीए ने ऐसा नही किया।

छात्रों को देर रात 11 बजे एडमिट कार्ड जारी किए गए और अगले दिन परीक्षा की सूचना दी गई। ऐसे में दूर दराज इलाके के छात्र परीक्षा में शामिल ही नही हो सके। शामिल होना तो दूर बच्चे अपना एडमिट कार्ड तक प्रिंट नही करा सके।

इसके अलावा देर रात हजारों छात्रों का परीक्षा केंद्र बदलने का फरमान जारी हुआ जिस वजह से हजारों छात्र सेन्टर तक पहुंच ही नही सके। दूसरी तरफ कई सेंटर पर भाषा बदलने तक का विकल्प नही मिला जिस वजह से हिंदी चुनने वाले छात्रों को समस्या का सामना करना पड़ा। वहीं कुछ छात्रों ने सीबीटी ऑप्शन चुना था लेकिन जब वह सेन्टर पर पहुंचे तो उन्हें ऑफलाइन मोड से एग्जाम देने को कहा गया।


इसके अलावा जो छात्र परीक्षा में शामिल हुए उनका आरोप है कि हर परीक्षा केंद्र में बदइंतजामी का आलम था। कहीं डेस्कटॉप खराब थे और बार बार बंद हो रहे थे तो कहीं ऑफलाइन मोड की परीक्षा के दौरान मिले प्रश्नपत्रों पर स्याही लगी हुई थी।

इसकी वजह से प्रश्न और ऑप्शन दोनो ही समझ नही आ रहे थे। छात्रों का यह भी कहना है कि प्रश्न पत्र पुराने सिलेबस के हिसाब से थे और पैटर्न भी पुराना था। कई छात्रों ने एक से अधिक कोर्स के लिए आवेदन दिया था। इसके लिए अलग से फी भी ली गई लेकिन अंतिम समय में दो अलग अलग परीक्षाओं को या तो एक साथ कर दिया गया या एक ही तारीख को आयोजन किया गया।


आंकड़ों की मानें तो इस साल बीएचयू की प्रवेश परीक्षा के लिए 5 लाख से ज्यादा छात्रों ने आवेदन किया था। इतनी बड़ी संख्या में छात्रों के शामिल होने की पूरी जानकारी भी एनटीए को थी। ऐसे में छात्रों के यह आरोप काफी गंभीर हैं। वहीं इस बाबत बीएचयू प्रशासन का रवैया और हैरान करने वाला है।

एक तरफ छात्रों का प्रदर्शन सड़क से सोशल मीडिया तक जारी है वहीं दूसरी तरफ विश्वविद्यालय के पीआरओ ने कहा कि वह इस मामले से अनभिज्ञ हैं। ऐसे में सवाल है कि क्यों न बदइंतजामी और अव्यवस्था से भरपूर रही प्रवेश परीक्षा को रद्द कर दुबारा छात्रों को मौका दिया जाए?

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