लखीमपुर- राजनीति का नया केंद्र और कुछ अनसुलझे प्रश्न

उत्तरप्रदेश में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसकी तैयारी भी जोर शोर से शुरू हो चुकी है। बीजेपी और खास कर सीएम योगी अपनी उपलब्धि बता वोट मांगने को तैयार नजर आ रहे हैं वहीं विपक्षी दल भी अब सक्रिय हो चुके हैं।

देश का सबसे बड़ा सूबा इन दिनों विवादों का सबसे बड़ा केंद्र है। क्या विपक्ष क्या मीडिया और क्या आमलोग सभी की निगाह इन दिनों यूपी की तरफ है। इसके पीछे की वजह है एक जिला लखीमपुर खीरी और वजह है किसान आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और उस दौरान हुई मौतें। आरोप-प्रत्यारोप के तीर जमकर चलाये जा रहे हैं।


विपक्ष का पूरा ध्यान इन दिनों लखीमपुर पर है। हो भी क्यों न अगले साल चुनाव जो हैं। खैर जो होड़ लखीमपुर पहुंचने की दिखी वह हिंसा से कहीं ज्यादा विभत्स है। जो हिंसा हुई उससे भी शायद ज्यादा। ऐसा क्यों न कहें?

आइये इसके पीछे के कुछ तर्क समझने की कोशिश करते हैं। आप और हम बहुत आसानी से मीडिया को गोदी मीडिया या बिकाऊ कह देते हैं लेकिन क्या आपने अपने किसी नेता या दल से यह सवाल किया कि माहौल और मौके की राजनीति की जगह वह एकजुट होकर वाजिब मुद्दों पर हर जगह एक सा सुर क्यों नही रखते?

जी नही आपमें न सवाल पूछने की हिम्मत है न आपके तथाकथित नेता में वह कुव्वत की वह जवाब दे सके। आप या किसी के लिए सबसे सॉफ्ट टारगेट मीडिया है। अब यह ध्यान रहे कि लखीमपुर में हुई हिंसा के दौरान मारे गए लोग मीडिया के लिए या तो अपना फर्ज निभा रहे थे, किसी के नौकर थे या अपने हक की मांग करने वाले आंदोलनकारी।


हालांकि इन सभी मौतों पर दुख जताने और एक समान मांग की जगह हमने चुना मुद्दा जिसपर राजनीति हो सके। हमने किसानों की बात की जो होनी ही चाहिए लेकिन हम उसी हिंसा में उसी दौरान और उसी जगह पीट पीट कर मार दिए गए पत्रकार और उस ड्राइवर को भूल गए जो महज अपने मालिकों के निर्देशों का पालन कर रहे दया अपना फर्ज निभा रहे थे।

इसके बाद भी अगर सवाल सिर्फ मीडिया पर हैं तो लानत है ऐसी सोच को। यह जांच का विषय था और है कि किसकी गलती है? किसकी वजह से यह हुआ लेकिन जहां परिवारों के चिराग उजाड़ दिए गए वहीं किसी एक के लिए कुछ और मांग और रवैया और दूसरे के लिए कुछ और बयान समझ से परे है।


खैर राजनीति शायद इसी का नाम है। आरोप-प्रत्यारोप इसके सबसे मजबूत स्तंभ है वह भी तब जब विपक्ष मुद्दा और नेतृत्व विहीन है। ऐसे में मौका भी बना और दस्तूर भी। क्या कांग्रेस, क्या आप और क्या तृणमूल सभी को आपदा में अवसर नजर आया कई राज्यों के नेता लाशों पर राजनीति करने की होड़ में नजर आए लेकिन कुछ सवाल हैं जिसका जवाब शायद किसी के पास नही है।

सबसे पहले एक उदाहरण कश्मीर से लेते हैं।एक विद्यालय में कुछ आतंकी घुसते हैं सबसे पहले शिक्षकों को लाइन में लगाते हैं, मजहब पूछते हैं और हिन्दू-सिख समाज के शिक्षकों को गोली मार देते हैं।


अब बंगाल की बात, चुनावों के बाद हुई हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए। वीडियो प्रमाण के साथ मौजूद हैं कितने लोग या नेता ने उसपे बात की या वहां गए और कानून व्यवस्था पर सवाल उठाए? इसके अलावा छत्तीसगढ़ की पुलिस ने चार आदिवासियों की फर्जी एनकाउंटर के दौरान हत्या की आज भी उनका आंदोलन अनवरत जारी है और वहां के सीएम लखनऊ में तमाशा करते दिखे।

पंजाब में राजनीतिक बवाल मचा है, मुद्दे गौण हैं और सीएम राजनीतिक टूर पर यूपी में हैं। महाराष्ट्र में पालघर में साधुओं की हत्या हो गई कितने नेताओं ने सवाल उठाए? राजस्थान में दलित और पिछड़ों, महिलाओं पर अपराध के रिकॉर्ड मामले दर्ज हुए किस राजनीतिक, दलित या महिला चिंतक को आपने सवाल उठाते सुना?

पंजाब और हरियाणा में लाठीचार्ज हुआ, कई किसानों की मौत हो गई लेकिन एक अजीब खामोशी है क्यों? इन सब का जवाब है कि इनमें से किसी राज्य में चुनाव नही है।


यह मुर्दों का देश है और राजनीति भी अब लाशों पर हो रही है। हमारी प्राथमिकताएं तेजी से बदली हैं। एडिटेड वीडियो आधे सच को स्वीकारने के हम आदि हो चुके हैं। ऐसे में न हम सच देखना चाहते हैं, न सुनना चाहते हैं और न ही इसपे बात करना चाहते हैं।

हमने राजनीति के अपने तथाकथित मसीहा चुने हैं और उनकी सरपरस्ती में इस कदर डूबे हैं कि सच झूठ का फर्क भूल बैठे हैं। सिर्फ यही नही लखीमपुर महज एक उदाहरण है। ऊपर के तर्क की काट भी आपके पास होगी लेकिन हां इसके अलावा भी कई ऐसे मुद्दे और उदाहरण हैं जिन पर हम बात या तर्क वितर्क तक करना उचित नही समझते हैं। हम कुछ कर सकते हैं तो व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी पर फैले कुतर्क।

लेकिन यकीन मानिए यह कुतर्क आपका आज नही तो कल नुकसान ही करेंगे और आप जैसे ही लोग उस वक़्त बिना सही गलत सोचे इसी लॉजिक पर उसे सच मान लेंगे। ध्यान रहे राजनीति में कोई किसी का नही। जहाँ जिसका फायदा वहां नेता और उनके समर्थक मिलेंगे। तय आपको करना है कि आज के इस आधुनिक युग मे भी आप दिए तले अंधेरा देखने के आदि हैं या तर्क-वितर्क कर सच जानने के।

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