केंद्र ने उच्चतम न्यायालय में साफ कर दिया है कि पिछड़े वर्गों की जाति आधारित जनगणना “प्रशासनिक रूप से कठिन और दुष्कर” है और जनगणना के दायरे से इस तरह की सूचना को अलग करना “सतर्क नीति निर्णय” है इसलिए वर्ष 2021 के लिए कोई जातिगत जनगणना नहीं होगी।

केंद्र का रूख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई राज्यों में इस तरह के जनगणना को लेकर मांग उठी है जिसमें महत्वपूर्ण रूप से हाल में बिहार राज्य से दस दलों के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में प्रधानमंत्री से मुलाकात कर इसे कराए जाने की मांग की थी।

उच्चतम न्यायालय में दायर हलफनामे के मुताबिक, सरकार ने सामाजिक आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी), 2011 में काफी गलतियां एवं अशुद्धियां बताई हैं।

महाराष्ट्र सरकार द्वारा दायर एक याचिका के जवाब में उच्चतम न्यायालय में यह हलफनामा दायर किया गया। महाराष्ट्र सरकार ने याचिका दायर कर केंद्र एवं अन्य संबंधित प्राधिकरणों से अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से संबंधित एसईसीसी 2011 के आंकड़ों को सार्वजनिक करने की मांग की और कहा कि बार-बार आग्रह के बावजूद उसे यह उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के सचिव की ओर से दायर हलफनामे में कहा गया कि केंद्र ने पिछले वर्ष जनवरी में एक अधिसूचना जारी कर जनगणना 2021 के लिए जुटाई जाने वाली सूचनाओं का ब्यौरा तय किया था और इसमें अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति से जुड़े सूचनाओं सहित कई क्षेत्रों को शामिल किया गया मगर इसमें जाति के किसी अन्य श्रेणी का जिक्र नहीं किया गया है।

सरकार ने कहा कि एसईसीसी 2011 सर्वेक्षण ‘ओबीसी सर्वेक्षण’ नहीं है जैसा कि आरोप लगाया जाता है, बल्कि यह देश में सभी घरों में जातीय स्थिति का पता लगाने की व्यापक प्रक्रिया थी।

केंद्र ने इसे सोचा समझा एक नीतिगत फैसला बताते हुए इस तरह की जानकारी को जनगणना के दायरे से अलग रखने की बात कही। उच्चतम न्यायालय(सुप्रीम कोर्ट) में केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में हलफनामा दायर किया गया जिसमें कहा गया है कि सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना 2011 में की गई थी और उसमें कई गलतियां और त्रुटियां थी।

केंद्र ने 2021 की जनगणना में जातियों की गिनती शामिल करने की मांग को मुश्किल बताते हुए तर्क दिया है जनगणना की तैयारी चार साल पहले ही शुरू हो जाती है। 2021 की जनगणना के चरण निर्धारित किए जा चुके हैं, ऐसे में अब बहुत देरी हो चुकी है क्योंकि जनगणना के सवाल अगस्त-सितंबर 2019 में ही फाइनल किए जा चुके थे।

यह मामला बृहस्पतिवार को न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ के द्वारा सुना गया। इस मुद्दे की अगली सुनवाई 26 अक्टूबर को तय की गई है।