प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद से बिहार सरकार सहित विपक्षी दलों को जातिगत जनगणना के मुद्दे पर केंद्र सरकार के जवाब का इंतजार था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का कहना था कि उन्हें प्रधानमंत्री से सकारात्मक जवाब की उम्मीद है।

हालांकि इस मांग को केंद्र ने ठुकरा दिया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर स्पष्ट कर दिया है देश में कोई जातिगत जनगणना नहीं होगी क्योंकि केंद्र सरकार के मुताबिक पिछड़े वर्गों की जाति आधारित जनगणना प्रशासनिक रूप से कठिन और दुष्कर है और जनगणना के दायरे से इस तरह की सूचना को अलग करना ‘सतर्क नीति निर्णय’ है।

इस फैसले को लेकर राजद प्रमुख लालू यादव ने ट्वीट कर रोष जाहिर किया है। उन्होंने लिखा “जनगणना में साँप-बिच्छू,तोता-मैना,हाथी-घोड़ा,कुत्ता-बिल्ली,सुअर-सियार सहित सभी पशु-पक्षी पेड़-पौधे गिने जाएँगे लेकिन पिछड़े-अतिपिछड़े वर्गों के इंसानों की गिनती नहीं होगी। वाह!

BJP/RSS को पिछड़ों से इतनी नफ़रत क्यों? जातीय जनगणना से सभी वर्गों का भला होगा।सबकी असलियत सामने आएगी। BJP-RSS पिछड़ा/अतिपिछड़ा वर्ग के साथ बहुत बड़ा छल कर रहा है।

अगर केंद्र सरकार जनगणना फ़ॉर्म में एक अतिरिक्त कॉलम जोड़कर देश की कुल आबादी के 60 फ़ीसदी से अधिक लोगों की जातीय गणना नहीं कर सकती तो ऐसी सरकार और इन वर्गों के चुने गए सांसदों व मंत्रियों पर धिक्कार है। इनका बहिष्कार हो।”

वहीं, राजद प्रमुख ने एक दिन पहले ही इस जनगणना को लेकर कहा था कि देश में आवश्यक होने पर यानि एससी, एसटी और पिछड़ों की संख्या ज्यादा पाए जाने पर आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा की जानी चाहिए।

लालू यादव का मानना है कि जातिगत जनगणना से यह पता चल पाता कि देश में किस जाति के कितने लोग हैं। इससे आगे उसी हिसाब से योजनाएं बनने से लोगों को उनका सीधा लाभ मिलता।

गौरतलब हो कि बिहार में जातिगत जनगणना को लेकर दो विरोधी सुर, राजद और जद(यू) साथ हैं। दोनों पार्टी के नेता लगातार इसकी मांग को लेकर आवाज उठाते रहे हैं। हालांकि भाजपा शुरू से ही इस मुद्दे पर सकारात्मक रवैये में नहीं दिखी।