मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए हालात ठीक होते नहीं दिखाई दे रहे हैं। विधानसभा में 43 सीटों के साथ जद(यू) तीसरे नंबर की पार्टी बन चुकी है और कहा जा रहा है कि भाजपा के मजबूत स्थिति में होने के कारण ही जद(यू) की कमान चल रही है।

एनडीए के साथ गठबंधन में आए नीतीश कुमार अगर ऐसे में भाजपा का साथ छोड़ते हैं तो उन्हें राजद के साथ हाथ मिलाना होगा जो कि इस मौजूदा हालात में ठीक नहीं बताए जा रहे हैं। एक-एक कर 45 विधायकों को साथ लाकर नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री की कुर्सी थामी है, ऐसे में वह किसी भी नेता को हाथ से जाने नहीं देना चाहते। इधर पार्टी के नेता सरकार पर आरोप-प्रत्यारोप मढ़ रहे हैं।

नीतीश कुमार इन नेताओं को खोना नहीं चाहते इसलिए काफी मान-मनौव्वल भी कर रहे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री की स्थिति को कमजोर होते हुए बताया जा रहा है। बिहार के समाज कल्याण मंत्री मदन साहनी ने बढ़ते नौकरशाही और अफसरों पर तानाशाही के आरोप लगाते हुए इस्तीफे की पेशकश की। उन्होंने कहा कि कोई भी अफसर या यहां तक कि चपरासी भी उनकी बात नहीं सुनता।

ऐसे में उन्हें यह पद नहीं चाहिए जिसकी कोई इज्जत ना हो। साथ ही मनजीत सिंह ने भी राजद में शामिल होने की खबरें बताई थी। हालांकि कोशिशों के जरिए मना कर नीतीश कुमार ने उन्हें जद(यू) में बने रहने के लिए राजी कर लिया है। नीतीश कुमार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है कि उनके सरकार में जनप्रतिनिधियों की बात नहीं सुनी जाती है। इधर लालू प्रसाद ने भी ट्वीट करके उन पर तंज कसते हुए कहा कि जद(यू) नेता थर्ड डिवीजन से परीक्षा पास कर मुख्यमंत्री बने।

उनकी यह टिप्पणी 2020 के बिहार के विधानसभा चुनाव में जद(यू) द्वारा जीते गए सीटों के संदर्भ में कही जा रही है। 2020 के चुनाव में सीटें जीतने के हिसाब से राजद और भाजपा पहले और दूसरे स्थान की पार्टी रही थी। एनडीए के गठबंधन दल के नेता और ‘हम’ के अध्यक्ष जीतन राम मांझी भी मुख्यमंत्री के शराबबंदी के फैसले के विपक्ष में खड़े होकर बयानबाजी करते नजर आए।

मांझी द्वारा शराब को बंद करने के फैसले को गलत ठहराया गया था। साथ ही लोजपा के चिराग पासवान भी नीतीश कुमार के खिलाफ ही रहते हैं। अपनी पार्टी में बगावत होने के बाद से चिराग नीतीश कुमार पर पार्टी तोड़ने और बिहार के बदइतंजामी के आरोप लगाते नजर आ रहे हैं। कई नेता यह आरोप लगाते हुए कहते हैं कि नीतीश कुमार ने अपने नेताओं से संवाद खत्म कर लिए हैं।

कोई भी बात करने से पहले बीच में कई अफसर और अधिकारी आ जाते हैं और इस वजह से बेहतर ढंग से बात ना हो पाने के कारण असंतुष्ट विधायकों और नेताओं की एक लंबी फेहरिस्त तैयार हो गई है।