बिहार विधानसभा के बहादुरपुर चुनाव क्षेत्र से प्रतिनिधि और बिहार के समाज कल्याण मंत्री मदन साहनी ने कथित अफसरशाही और तानाशाही से तंग आकर इस्तीफे की पेशकश की है। राज्य के नौकरशाही पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि अफसर उनकी बात नहीं सुनते। यहां तक कि उन्होंने दिए गए घर और कार के ऊपर भी नाराजगी जताई है।

समाचार एजेंसी एएनआई के द्वारा किए गए ट्वीट के मुताबिक मदन साहनी का कहना है कि, “मैं यह इस्तीफा नौकरशाही के खिलाफ प्रस्तुत कर रहा हूं। मुझे मिले घर या वाहन से भी खुश नहीं हूं क्योंकि अगर मैं लोगों की सेवा नहीं कर सकता, अगर अफसर मेरी बात नहीं सुनते तो लोगों के कार्य कभी पूरे नहीं हो सकते।

ऐसे में अगर उनके काम पूरे नहीं होते तो मुझे यह कुछ भी नहीं चाहिए।” पटना में मीडिया से बात करते हुए साहनी ने कहा कि उनका यह फैसला जल्दबाजी में लिया हुआ नहीं है। “नौकरशाह किसी की बात नहीं सुनते। अफसर खुद तानाशाह बने बैठे हैं। वह मंत्री तो क्या किसी जनप्रतिनिधि तक की बात नहीं सुनते।

कैबिनेट का निर्णय है कि 30 जून तक ट्रांसफर होना है,लेकिन तीन दिनों से अधिकारी फाइल दबाए बैठे हैं।” उन्होंने कहा। पार्टी छोड़ने के सवाल पर अपना रुख साफ करते हुए उन्होंने कहा कि वह पार्टी में और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बने रहेंगे।

मंत्री ने अपने पिछला वर्ग के होने का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें इस कारण से दबाया जाता है और कोई उनकी बात नहीं सुनता। उन्होंने बताया कि यह पहली बार नहीं है कि उन्हें इस तरह दबाया गया हो। कोई उनकी बात सुनने वाला नहीं है। बर्दाश्त की सीमा से बाहर होने लगने के कारण उन्होंने इस्तीफे की बात कही। ऐसे में उन्हें जीतन राम मांझी का समर्थन मिला है।

‘हम’ के अध्यक्ष और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने भी आरोप लगाते हुए कहा कि, बिहार सरकार के अधिकारी मंत्रियों और विधायकों की नहीं सुनते। यह मुद्दा पहले भी भाजपा और जद(यू) नेताओं के सामने उठाया गया था। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार से पहले भी इस मामले के ऊपर कहा जा चुका है कि अफसरों द्वारा बात सुनने और काम करने से ही विधायकों की इज्जत बढ़ेगी।