बिहार में जब कोरोना काल के दौरान 2020 में चुनाव हुए तो तमाम आशंकाएं प्रबल थी। एक तरफ तेजस्वी का आक्रामक तेज था तो दूसरी तरफ एनडीए के सबसे अहम सहयोगी रहे रामविलास पासवान के सुपुत्र चिराग की बगावत थी। नीतीश का अनुभवी चेहरा और सुशासन के वादे थे वहीं बीजेपी में चेहरे का घोर अभाव भी था।


हालांकि चुनाव परिणाम आने के साथ ही यह तस्वीर साफ हो गई थी कि दशकों नीतीश की अगुवाई में छोटे भाई की भूमिका में रहने वाली बीजेपी जल्द ही बड़े बदलाव के साथ सामने आ सकती है। यह बदलाव त्वरित तौर पर दिखे और बिहार में दो उप मुख्यमंत्री के फार्मूले के साथ सरकार का गठन हुआ। खास बात यह रही कि सुशील मोदी किनारे कर दिए गए।


यह बदलाव त्वरित तो थे लेकिन दूरगामी नही थे। रेणु देवी और तारकिशोर प्रसाद एक विकल्प जरूर बने लेकिन बिहार बीजेपी का चेहरा बन नही सके। यही वजह है कि महीनों बीतने के बाद भी मंत्रिमंडल विस्तार नही हो सका है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी में न सिर्फ आमूलचूल परिवर्तन किए बल्कि अरुणाचल में बीजेपी के हाथों मात भी खाई।


राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले नीतीश की हालत खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे सी है। यह हम नही लालू प्रसाद यादव एक ट्वीट के जरिये कह चुके हैं। वजह भी है। वह वजह है बिहार में क्राइम का बढ़ा ग्राफ और नीतीश के गुस्से वाले तेवर। नीतीश कुमार यूँ तो शांत और सौम्य व्यक्तित्व के धनी माने जाते थे लेकिन बदले राजनीतिक समीकरण और क्राइम ग्राफ ने नीतीश का पारा हाई कर दिया।


इन सब के बीच बिहार के सियाशी गलियारों से एक और बड़ी खबर उस वक़्त सामने आई जब भागलपुर से 2014 का लोकसभा चुनाव हारने वाले और उसके बाद राष्ट्रीय राजनीति में तटस्थ रहने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन को बीजेपी की तरफ से विधान परिषद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया।


शीर्ष पदस्थ सूत्रों की मानें तो यह परिवर्तन आम नही है। यूँ ही शाहनवाज़ को राष्ट्रीय राजनीति से राज्य की राजनीति में शिफ्ट नही किया गया है। आने वाले दिनों में शाहनवाज़ बिहार की राजनीति में बीजेपी की तरफ से सबसे बड़ा राजनीतिक चेहरा हो सकते हैं। उन्हें न सिर्फ नीतीश के विकल्प के रूप में पेश करने की तैयारी है बल्कि आने वाले दिनों में अगर नीतीश न माने तो शाहनवाज़ को सामने रख प्लान बी भी तैयार करने की रणनीति है।


दिलचस्प यह देखना है कि सालों तक राजनीति में तटस्थ रहने वाले शाहनवाज़ को बीजेपी क्या अहम रोल देती है और इसका राजनीति के रिसर्च सेंटर कहे जाने वाले बिहार की राजनीति में कितना असर होता है यह तो वक़्त ही बताएगा। हालांकि एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि झारखंड में रघुबर दास, हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर, यूपी में योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत के नाम का ऐलान कर चौंका चुकी बीजेपी आने वाले दिनो में बिहार में शाहनवाज़ हुसैन पर बड़ा दांव खेलने जा रही है। साथ ही फिलहाल उन्हें गृह विभाग की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि शाहनवाज़ न सिर्फ एक अनुभवी राजनेता हैं बल्कि उनकी केंद्र और संगठन में पकड़ भी अच्छी मानी जाती है। इसके अलावा एक प्रवक्ता और जम्मू कश्मीर में प्रभारी के तौर पर वह अपनी काबिलियत भी साबित कर चुके है।

इसके अलावा वह मुख्तार अब्बास नकवी के अलावा पार्टी के लिए सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा भी हैं जिसका लाभ बीजेपी को न सिर्फ बिहार बल्कि अन्य राज्यों में बड़े पैमाने पर मिल सकता है। यही वजह है कि शाहनवाज़ पर देर से ही सही बीजेपी बड़ा दांव खेलने को तैयार है।