बिहार विधानसभा चुनावों के नतीजों को लेकर अब तस्वीर साफ हो चली है। बिहार में एक बार फिर लगातार चौथी बार नीतीश कुमार का नारा चरितार्थ होने को है। अंतर बस इतना है कि इस बार नीतीश से आगे बीजेपी निकल चुकी है।

बिहार की राजनीति में हमेशा बड़े भाई की हैसियत रखने वाले नीतीश और जदयू को इस बार रेस में नंबर तीन से संतोष करना होगा।


बिहार चुनावों की शुरुआत से पहले जब चिराग ने नीतीश को अपने निशाने पर लिया और बीजेपी के साथ चलने की रणनीति अपनाई तभी यह कयास लगाए जाने लगे थे कि इसका खामियाजा नीतीश को भुगतना होगा।

हालांकि नीतीश ने चिराग को खास तवज्जो नही दी और उनकी मांगें नही मानी गई। लिहाजा चिराग एनडीए से अलग हुए लड़े और बेशक कई सीटें न जीतें लेकिन नीतीश को कई सीटें हरा जरूर दी। आज नतीजों के एलान के बाद यह तस्वीर ज्यादा साफ है।


अब बात नीतीश कुमार की करें तो नीतीश बिहार की राजनीति में कितने बड़े फैक्टर हैं इस सवाल का जवाब भी आज नतीजों के आने के साथ ही साफ हो गया। नीतीश की पार्टी 15 साल सत्ता में रहने के बाद भी आज तीसरे नंबर पर है वहीं गठबंधन में वह नंबर एक हैं।

यह अकेले बेशक नीतीश या जदयू की उपलब्धि नही है लेकिन सोशल इंजीनियरिंग के महारथी नीतीश ने ब्रांड मोदी की आड़ में एंटी इनकम्बेंसी की हवा को बहुत हद तक रोकने में सफलता हासिल कर ली है।