बिहार विधानसभा चुनाव जब कोरोना काल मे कराए जाने की घोषणा हुई तो अनुमान लगाया गया कि यह चुनाव बाकी पिछले कुछ सालों में हुए चुनावों से अलग होंगे। एक्चुअल रैली और जनसंपर्क का दायरा सीमित होगा और सोशल मीडिया का प्रयोग सबसे ज्यादा किया जाएगा।

हालांकि बीतते वक़्त के साथ चुनाव आयोग द्वारा जारी गाइडलाइंस और कोरोना प्रोटोकाल की धज्जियां उड़ा दी गई और भीड़ अब समर्थन का पैमाना फिर से मानी जाने लगी।


भीड़ को पैमाना बता समर्थकों ने सीएम और मुद्दे दोनो तय कर दिए। तेजस्वी के समर्थकों ने जहां उनकी रैलियों में उमड़ी भीड़ का हवाला देते हुए कहा कि इस बार बिहार में बदलाव देखने को मिलेगा वहीं मोदी की कल बिहार चुनाव में हुई एंट्री और जुटी भीड़ ने बीजेपी के कार्यकर्ताओं को यह मौका दे दिया। इसके अलावा उपेंद्र कुशवाहा-मायावती, पप्पू यादव- चंद्रशेखर की रैलियों में उमड़ी भीड़ पर उनके समर्थकों के बीच ऐसी ही चर्चा बढ़ने लगी।


अब ऐसी चर्चाओं के बीच सबसे बड़ा कंफ्यूजन यह है कि अगर भीड़ सभी नेताओं की रैलियों में है और सभी को जनता का समर्थन मिल रहा तो जीत कौन रहा? ऐसे में क्लैरिटी के लिए सर्वे पहला सहारा है वहीं ग्राउंड रिपोर्ट अपनी जगह है।

सोशल मीडिया भी इसको आंकने का एक पैमाना हो सकता है। भीड़ पर गौर करें और भीड़ में शामिल लोगों से सवाल करें तो वह दो वजहों से आते हैं। पहला नेता को देखने, सुनने और दूसरा हेलीकाप्टर देखने का शौक उन्हें खींच लाता है।


रैली में भीड़ की बात करें तो मोदी की बराबरी शायद ही कोई कर सके। इसके बाद बीजेपी के कुछ नेताओं और तेजस्वी का नंबर आता है। इसके अलावा पप्पू यादव और कुशवाहा भी अपने गठबंधन के सीएम उम्मीदवार हैं ऐसे में उनको लेकर भी लोगों में उत्साह है।

इसके अलावा चिराग पहली बार बिहार चुनावों में सुपर एक्टिव हैं ऐसे में उन्हें देखने की होड़ भी लोगों को आकर्षित कर रही है। ऐसे में भीड़ देख यह तय करना मुश्किल है कि बिहार की जनता किसके पक्ष में है।