बिहार और बिहार में भी गया जिले से कई ऐसी कहानियां और किस्से हैं जो न सिर्फ अचंभित कर जाते हैं बल्कि यह सोचने पर विवश कर देते हैं कि क्या ऐसा हो सकता है? क्या अकेला एक इंसान ऐसा कर सकता है और भी न जाने कितने सवाल एक साथ दिमाग मे उभर आते हैं।

आपने दशरथ मांझी और लौंगी भुइयां की कहानी तो पढ़ी ही होगी और आपने ऐसा सोचा भी होगा कि आखिर यह किस मिट्टी के बने हैं? ऐसी ही एक और खबर बिहार के गया से ही आई है।


यह कहानी है दिलीप कुमार की जिन्होंने एक वीरान सुनसान जगह को अपनी मेहनत और लगन से एक हरे भरे जंगल मे बदल दिया। उन्होंने अपनी जिंदगी ही इसे सजाने-संवारने में बीता दी है। खास बात यह है कि यहां का हर पेड़ एक शहीद की वीरता के नाम है। हालांकि किसी भी तरह की सरकारी सहायता न मिलने की एक टीस जरूर है लेकिन वह इसे बाधा नही मानते हैं।


समाचार एजेंसी एएनआइ से बातचीत में दिलीप कहते हैं, “बचपन में ये जगह बिलकुल वीरान थी। मैंने 1983 से यहां पौधारोपण करना शुरू किया। स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों के नाम से मैं ये पौधे लगाता हूं ताकि उन्हें सदियों तक याद रखा जा सके। इस स्थान पर इमारती लकड़ी, छायादार और फलादार वृक्ष लगाए गए हैं।


सरकारी सहायता के नाम पर आज तक दिलीप को बस सीएम नीतीश कुमार की तरफ से बस एक प्रशस्ति पत्र मिला है, इसके बारे में बताते हुए दिलीप कहते हैं,”मुझे इसके लिए एक बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने प्रशस्ति पत्र दिया था।

उसके बाद सरकार से किसी तरह की मदद नहीं मिली। मेरी उनसे यही मांग है कि इसे वन क्षेत्र घोषित किया जाए। प्रधानमंत्री जी से अनुरोध है कि प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण पर अधिक बल दें।


दिलीप के इस जज्बे को सलाम और उम्मीद है इस खबर के बाद सीएम और पीएम का ध्यान उनकी प्रकृति के प्रति अथक मेहनत और परिश्रम की ओर जाएगा और इसे सजाने और संवारने के लिए सरकारी मदद मिल पाएगी।

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