2019 में लोगों में डर और सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता लाने के लिए मोटर वाहन अधिनियम में व्यापक पैमाने पर सुधार किए गए थे। इन सुधारों के तहत जुर्माने की राशि कई गुना बढ़ाई गई थी। इसके पीछे दलील दी गई कि अगर जुर्माने की राशि ज्यादा होगी तो लोगों में डर होगा और इसका पालन लोग करेंगे। हालांकि नतीजे ढाक के तीन पात ही रहे और कोई बहुत बड़ा क्रांतिकारी बदलाव नही देखने को मिला।


ठीक इसी तर्ज और इसी लॉजिक पर कोरोना के बढ़े मामलों को देखते हुए झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने तय किया कि महामारी के इस दौर में अगर कोई बिना मास्क पहने सार्वजनिक स्थानों पर मिला तो उससे एक लाख का जुर्माना वसूला जाएगा। लोगों में थोड़ा डर भी हुआ लेकिन शायद यह क्षणिक साबित हुआ। ऐसा नही है कि लोगों में कोरोना का खौफ कम हुआ या पुलिस ने शिथिलता बरती या जुर्माने को लेके कोई भय नही है?


ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि एक लाख की तय कानूनी रकम के बीच पुलिस अपनी जेब भरने लगी। झारखंड के अलग अलग जिलों से प्राप्त जानकारी और विश्वस्त सूत्रों की मानें तो पुलिस 50 से लेकर 500 या 1000 रुपये तक बिना रशीद के चालान काट रही है। यह बताने की जरूरत नही की यह पैसा कहां जाता है।

देवघर सहित कुछ बड़े शहरों जैसे बोकारो, दुमका, जमशेदपुर की बात करें तो मास्क और मोटर अधिनियम दोनो में तय जुर्माने की रकम ज्यादा है ऐसे में कमबेश के आधार पर मामला निपटाया जाता है। जहां आम नागरिकों के लिए रिश्वत के आधार पर तय यह सौदा फायदे का है वहां राजस्व का नुकसान सरकार को उठाना पड़ रहा है। साथ ही पुलिस वालों की जेब अलग से गर्म हो रही है।