देश मे जब उंगलियों पर गिने जाने मात्र केस थे तब सरकारों ने लॉकडाउन लगाया और अब जबकि हर दिन देश के हर राज्य में कोरोना संक्रमण के मामले हर दिन नए रिकॉर्ड बनाने पर आमादा हैं, 68 हजार से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हैं ऐसे में परीक्षा के आयोजन का औचित्य समझ से परे नजर आता है। आर्थिक गतिविधियों के बंद होने से जीडीपी,रोजगार का बुरा हाल है और उन्हें सुचारू रूप से शुरू करने की जगह परीक्षा को प्राथमिकता देना कितना उचित है?


समय-समय पर अलग-अलग विश्वविद्यालय सीनेट सहित अन्य कमिटियों की बैठक कर ऐसे फैसले लेते रहे हैं कि विषम या किसी अपवाद वाली परिस्थिति में छात्रों की योग्यता का मूल्यांकन किस तरह करना है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग की तरह बाकी यूनिवर्सिटी भी असाइनमेंट देकर ऐसे आकलन क्यों नही कर सकती हैं? क्यों नही पुराने नतीजों को ध्यान में रखकर छात्रों को प्रोमोट किया जाए?


कोरोना के अलावा छात्रों के सामने बाढ़ और यातायात सुविधा जैसी बड़ी चुनौतियां हैं। उनके रहने-खाने की व्यवस्था भी दूभर है। आज के समय में जब अपने नाते-रिश्तेदार भी परहेज कर दही ऐसे वक्त में परीक्षा का आयोजन एक ऐसी जिद्द है जो न सिर्फ कोरोना के संक्रमण को गई गुना बढ़ा सकती है बल्कि लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच कई राज्यों के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।


उदाहरण की बात करें तो बस से कुछ छात्र ग्वालियर परीक्षा देने पहुंचे। एक तो इतनी लंबी दूरी बस से यात्रा करना और ऊपर से लगभग 20 दिन वहां उनके सामने रहने-खाने का संकट है। ऐसे में न सिर्फ आर्थिक बोझ बढ़ा है बल्कि शारीरिक और मानसिक परेशानी का भी सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद सरकारों की जिद्द समझ से परे है।