पीएम मोदी ने कल एक वीडियो और उसके साथ एक कविता शेयर की थी। इस वीडियो में एक के बाद एक तस्वीरें चल रही थी जिसमे पीएम राष्ट्रीय पक्षी मोर को अपने हाथों से दाना खिलाते दिखाई दे रहे हैं। पीएम आवास में मोरों के अठखेलियों की यह तस्वीरें बहुत ही मनमोहक थीं। देखते ही देखते यह तस्वीरें सोशल मीडिया और मेन स्ट्रीम मीडिया में वायरल हो गई। हालांकि अब इन तस्वीरों पर एक नया विवाद उठ खड़ा हुआ है।


सोशल मीडिया सहित अन्य जगहों पर लिख कर लोग यह सवाल उठा रहे कि 2017 में लालू प्रसाद यादव की तबियत जब खराब थी और उनके पुत्र तेज प्रताप यादव वन एवं पर्यावरण मंत्री थे तब ज्योतिषियों की सलाह पर दो मोर लालू आवास में लाए गए थे। बाद में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम का हवाला देते हुए लालू पर राष्ट्रीय पक्षी को कैद रखने का मुकदमा दर्ज हुआ था। हालांकि मोर इस विवाद के बाद लालू आवास से बरामद नही हुए थे। ऐसे में अब सवाल यह है कि अगर लालू पर मुकदमा हो सकता है तो पीएम मोदी पर क्यों नही? क्या कानून सब के लिए अलग-अलग है?


आइए जवाब जानते हैं। कानून सभी के लिए बराबर है लेकिन मोर को पालने या कैद करने और मोर के स्वेच्छा से उन्मुक्त विचरण करने, दोनो ही बातों में अंतर है। लालू यादव के आवास पर मोर खुद से नही आए थे लाए गए थे जबकि प्रधानमंत्री आवास दिल्ली में जहां है वह इलाका मोरों के प्रजनन का बड़ा केंद्र है। इस इलाके में मौजूद हर आवास में मोर उन्मुक्त विचरण करते नजर आते हैं। दिल्ली के समालखा इलाके में बने फार्म हाउस की तरफ को भी आपको यूँ ही घूमते मोर कभी भी दिख जाएंगे। ऐसा ही छतरपुर की तरफ भी है। आप कानपुर के रास्ते जब दिल्ली जाएंगे तो कई गांव ऐसे हैं जहां रेलवे लाइन के किनारे राष्ट्रीय पक्षी का दीदार आपको आसानी से हो सकता है। ऐसे में पीएम आवास में मोरों का आगमन आम है और यह वन्य जीव संरक्षण के अंतर्गत नही आता है।