बिहार में जब 2015 में शराबबंदी का ढोल पूरे लाव लश्कर के साथ पीटा गया तब उम्मीद थी कि इस पिछड़े राज्य में शायद कुछ बड़े सामाजिक और आर्थिक बदलाव देखने को मिलेंगे लेकिन जैसे जैसे समय बीता यह राजनीतिक मुद्दे से ज्यादा और कुछ भी साबित नही हुआ। आज खबरों के आर्काइव से गुजरते हुए बीबीसी के एक ऐसी ही खबर नजरों के सामने आई। यह खबर बीबीसी ने 6 मई 2019 को की थी। इस खबर में बिहार डीजीपी की तरफ से बीबीसी को उपलब्ध कराए गए आंकड़ों को पढ़ आप हैरान हो जाएंगे।


खबर के मुताबिक 2015 से लेकर 2019 में इस खबर के लिखे जाने तक शराबबंदी कानून का उल्लंघन करने के मामले में एक लाख से ज्यादा केस दर्ज किए गए। डेढ़ लाख से ज्यादा लोग गिरफ्तार किए गए। खबर के मुताबिक डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय की तरफ से यह आंकड़ें बीबीसी को उपलब्ध कराए गए थे। इसके मुताबिक 1,16,670 मामले दर्ज हुए और 1,61,415 लोग गिरफ्तार हुए वही इनमे से 13,214 लोगों पर इसके अवैध व्यापार या इससे जुड़े गिरोह का साथ देने का शक होने पर मुकदमे दर्ज हुए।
कुल 50,63,175 लीटर शराब बरामद की गई। 1 अप्रैल 2016 से लेकर 31 मार्च 2019 तक के आंकड़े बताते हैं कि हर तीन मिनट में एक लीटर शराब बरामद की गई जबकि हर दस मिनट में एक व्यक्ति इस कानून के उल्लंघन के मामले ने जेल भेजा गया। इसी कानून के पालन में लापरवाही बरतने के मामले में 430 पुलिस कर्मियों पर भी करवाई की गई। इनमे से 56 पुलिस कर्मी बर्खास्त तक किये गए।


ऊपर दिए गए आंकड़े साल भर से ज्यादा पुराने हैं। अगर पिछले एक साल में आए आंकड़ों को जोड़ दें तो अलग ही तस्वीर सामने नजर आएगी। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि ऐसे कानून और ऐसी शराबबंदी का क्या फायदा? शराबबंदी के अगर एक सामाजिक पक्ष को भी देखें तो बहुत अंतर नही आया। ब्लैकमार्केटिंग बढ़ी। झारखंड, नेपाल और यूपी से नजदीक बॉर्डर की वजह से इसे रोकना बहुत बड़ी चुनौती बनी और सरकार को राजस्व का घाटा हुआ सो अलग। ऐसे में सवाल है कि क्या इसे महज नाक का सवाल मानते हुए बिहार के मुखिया ने इसे अपनी जिद बना दिया? क्यों नही इससे होने वाले सामाजिक और आर्थिक नुकसान की बात सोची गई? क्या यह मुद्दा इस बार बिहार चुनाव में दलों की प्राथमिकता बनेगा?


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