मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अभी दो दिन पहले एक ऐलान किया और कहा कि मेरे राज्य के भांजे-भांजियों के लिए एक अहम घोषणा है। इस घोषणा के मुताबिक अब राज्य में सरकारी नौकरी में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। इस खबर पर जहां सोशल मीडिया पर मिली जुली प्रतिक्रिया दिखी वहीं इसी राज्य से शिक्षा से जुड़ी एक ऐसी खबर आई जो आपको सरकारी व्यवस्था की एक ऐसी बानगी दिखाएगी कि आप हैरान तो होंगे लेकिन एक पिता पर आपको गर्व भी महसूस होगा।


एनडीटीवी की एक खबर के मुताबिक यह मामला मध्यप्रदेश के धार जिले का है। यहां सरकार ने ‘रुक जाना नही’ अभियान के तहत ऐसे बच्चों को दुबारा परीक्षा में शामिल होने का मौका देती है जो 10वीं या 12वीं की परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गए थे।

खबर के मुताबिक धार जिले के मनवार तहसील के रहने वाले शोभाराम के बेटे आशीष की परीक्षा थी। उसका परीक्षा केंद्र उसके घर से 105 किमी दूर धार में था। कोरोना महामारी के इस दौर में एक तो इतनी दूर परीक्षा केंद्र बनाना ही समझ से परे है। खैर कोई उपाय न देखे पेशे से मजदूर शोभाराम अपने बेटे को साईकल पर बैठा कर रात 12 बजे परीक्षा दिलाने निकल पड़े।

धार में उनके पास रुकने का कोई इंतजाम नही था। इसलिए वह तीन दिन का खाना भी अपने साथ ले आए। इस बाबत पूछे जाने पर शोभाराम ने एनडीटीवी से बातचीत में कहा कि मैं मजदूर हूँ लेकिन अपने बेटे को अफसर बनाने का सपना मैंने देखा है। ऐसे में मैं उसकी पढ़ाई में किसी भी मजबूरी को बाधा नही बनने देना चाहता। वह पढ़ने में अच्छा है और मेहनती भी है लेकिन बदकिस्मती से परीक्षा के समय लॉकडाउन और अच्छी पढ़ाई का इंतजाम न होने से वह फेल हो गया।

‘रुक जाना नही’ अभियान के तहत अब उसने दुबारा परीक्षा देने की जिद ठान ली और उसने इसके लिए काफी मेहनत भी की थी। बसों का परिचालन बंद है ऐसे में मेरे पास साईकल से जाने के अलावा कोई और विकल्प नही था। उसे परीक्षा दिलाने के लिए मैंने 500 रुपये उधार लिए हैं और खाने का सामान भी ताकि तीन दिन तक कोई दिक्कत न हो। रास्ते मे हम कहीं नही रुके इससे देर होने का अंदेशा था।
इस खबर को पढ़ने कर बाद जहां इस मजदूर पिता और उसके बेटे पर गर्व महसूस हो रहा वहीं लंबी-चौड़ी घोषणाओं और सरकारी व्यवस्था पर तरस आती है। क्या ऐसे युवाओं को मौका देने की ही बात शिवराज सिंह चौहान ने कही थी